वामन अवतार की कथा

भगवान के वामन अवतार की कथा

भगवान के वामन अवतार की कथा भागवत के आठवें स्कंध के अध्याय 18 में वर्णित है । भगवान वामन देव माता अदिति के गर्भ से अवतरित हुए थे । जब भगवान अदिति के गर्भ से अवतरित हुए तो उनके चार हाथ थे और वे संख, चक्र, गधा और पद्म से सोभित थे ।

राजा बलि द्वारा भगवान के वामन अवतार को दिया गया दान

इससे पता चलता है कि भगवान का जन्म नहीं वल्कि अवतार होता है । भगवान के जन्म और कर्म दिव्य होते हैं । श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय के नौवें श्लोक में भगवान कहते हैं कि उनके जन्म और कर्म दिव्य होते हैं और जो कृष्ण की इस दिव्य प्रकृति को जानते हैं वी दोबारा यहां जन्म लेकर नहीं आते वल्कि भगवान में धाम को प्राप्त करते हैं ।

भगवान के वामन अवतार के जश्न में अप्सराओं, यक्षों, गंदर्भों और देवताओं ने भगवान की स्तुति की । जब प्रजापति कश्यप मुनि को पता चला कि उनके पुत्र के रूप में स्वयं भगवान ने अवतार लिया है तो वे बहुत खुश हुए । कुछ है समय बाद भगवान ने चार भुजाओं वाले दिव्य रूप को त्याग कर एक ब्राह्मण बालक का रूप धारण कर लिया ।

इसके बाद भगवान के वामन अवतार राजा बलि पर कृपा करने के लिए चल पड़े । राजा बलि उस समय अस्वमेध यज्ञ कर रहे थे । जब यज्ञ संपन्न हो गया था तब भ्रगुवंशी तर्क वितर्क में लीन थे । उसी समय भगवान के वामन अवतार यज्ञशाला में उपस्थित हुए ।

भगवान के वामन अवतार की कांति सूर्य के समान प्रतीत हो रही थी । भगवान के वामन अवतार ने हाथ में छाता और कमंडल लिए हुए थे । यज्ञ के पुरोहितों ने उठकर भगवान वामन देव को प्रणाम किया । भगवान को देखकर बलि महाराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने भगवान के चरण धोकर उनकी पूजा की । बलि महाराज ने कहा कि हे ब्राह्मण श्रेष्ठ आप ने हमारे यज्ञ में आकर इसे सफल कर दिया । लगता है आप मुझसे कुछ मांगने आए हैं ।

महराज बलि का यश

आप जो चाहे मांग सकते हैं । धन, गाय, हाथी घोड़े, रथ, गांव सोना इत्यादि । भगवान के वामन अवतार ने कहा कि हे राजन आप महान हैं । आपके वंश में कोई भी ऐसा नहीं जन्मा जैन कंजूसी की हो और दान देने का वादा करके दान ना दिया हो ।

भगवान के वामन अवतार ने बताया कि आपके वंश में ही हिरण्याक्ष पैदा हुआ था जो पृथ्वी को जीतने के लिए अकेले ही निकल पड़ा था । भगवान विष्णु ने उसे बड़ी कठिनता से मारा था । आपके पिता विरोचन बड़े ही धर्मात्मा थे । जब देवता उनसे उनकी आयु मांगने ब्राह्मण का भेष बनाकर आए तो सब कुछ जानते हुए भी उन्होंने उन्हें मना नहीं किया ।

भगवान के वामन अवतार ने कहा कि ऐसे कुलीन राजा से वे तीन पग पृथ्वी ही केवल मांगते हैं क्योंकि ब्राह्मण अगर अपनी जरूरत के मुताबिक ही दानेता है तो वह पाप कर्मों में नहीं फसता । राजा बलि ने कहा कि हे बालक लगता है तुम्हारी बुद्धि छोटी है और तुम्हें अपने हित का ठीक से ज्ञान नहीं ।

तुम मुझसे समस्त द्वीप मांग सकते हो क्यूंकि में तीनों लोकों का स्वामी हूं । राजा बलि ने कहा कि जो कोई भी मुझसे एक बार कुछ मांग लेता है उसे दोबारा किसी से कुछ मांगने की जरूरत नहीं पड़ती । इसलिए तुम मुझसे कम से कम उठी भूमि मांगो जिस में तुम्हारा जीवन यापन हो जाए ।

शुक्राचार्य ने राजा बलि को रोकने की कोशिस की

भगवान के वामन अवतार में कहा कि जिस व्यक्ति कि इंद्रियां संयमित नहीं हैं उसे तीनों लोकों के संसाधन मिलने पर भी शांति नहीं मिल सकती । राजा बलि यह सुनकर हंस पड़े और उन्हीं कहा कि ठीक है तुम्हारी जो इच्छा है उसे प्राप्त करो । इसके बाद राजा बलि ने भगवान के वामन अवतार को तीन पग पृथ्वी देने के लिए प्रतिज्ञा करने के लिए जल पात्र हाथ में उठाया ।

राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य ने तुरंत ही राजा बलि को रोका और कहा कि यह ब्रह्मण बालक के रूप में जो बालक है वो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हैं । ये देवताओं का हित करने के लिए अवतरित हुए हैं । इनको तीन पग पृथ्वी का वचन देने में आपनी हानि है ।

शुक्राचार्य ने कहा कि भगवान एक पग में सारी पृथ्वी नाप लेंगे । इसके बाद वे अपने विश्वरूप का विस्तार करने के बाद दूसरे पग में आकाश को नाप लेंगे तब तुम उनको तीसरा पग रखने के लिए कौन सा स्थान दोगे । तीन पग पृथ्वी दान ना दे पाने के कारण तुम अपना वचन भी पूरा नहीं कर पाओगे और इसलिए तुम्हीं हमेशा के लिए नरक में वास करना पड़ेगा ।

सुक्राचार्य ने कहा कि भले ही आपने तीन पग पृथ्वी देने का वचन दिया है लेकिन अभी इससे मुकर सकते हैं । क्योंकि वेदों में वर्णित वही वचन मानने योग्य हैं जिनकी शुरुआत ॐ सी की गई हो । आपने वामन देव को वचन देते वक्त ॐ का इस्तेमाल नहीं किया था ।

शुक्राचार्य ने कहा कि प्राणों की रक्षा में लिए झूठ बोला जा सकता है । अगर आप भगवान को सारी पृथ्वी दे देंगे तो आपका जीवन निर्वाण भी नहीं हो सकेगा । आपके पितरों का तर्पण नहीं होगा और आपको इस कारण से पाप लगेगा । भलाई इसी में है कि भगवान को अभी माना कर दिया जाए । राजा बलि नहीं माने और आगे क्या क्या हुआ बताएंगे आपको अगले लेख में ।

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