रामायण की वो रात जिसके बारे में बताया नहीं जाता

मित्रों, राम, नाम सुनते ही मानव आत्मा को मुक्ति मिल जाती है, यूं ही नहीं, प्रभु श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम और आदि पुरुष कहा जाता है, उन्हें अपने त्याग, समर्पण, आगेकारी, प्रेम जैसे व्यवहार के लिए जाना जाता है, बता दें कि भगवान राम को लेकर बहुत सी बातें बताई जाती हैं, लेकिन अभी भी कुछ ऐसी बातें हैं जो दुनिया के लोगों से छिपी हुई है, अब वो बातें कौन सी हैं यह जानने के लिए आखिर तक बने रहे, नमस्कार, स्वागत है आपका, यह बात उस समय की है जब महाराज दशरथ के चारों पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघण अपनी शिक्षा दीक्षा पूरी करके अयोध्या लौट आए थे, उसके बाद चारों भाइयों की शादी महाराज जनक की पुत्रियों से हुई, यह सब देखकर महाराज दशरथ अपने सबसे बड़े बेटे राम को अयोध्या का राजा बनाने का फैसला लेते हैं, यह फैसला सुनते ही सभी बहुत खुश हो गए थे, लेकिन महारानी कैकई की दासी मंथरा इस बारे में महारानी के मन में जहर घोलती हैं और राम जी को राजा ना बनने देने के लिए उकसाती हैं।

वैसे तो महारानी कैकई राम जी से बहुत प्यार करती थी, लेकिन वो उस समय मथुरा की जाल में ऐसे फंस जाती हैं और इसी वजह से उन्होंने महाराज दशरथ को उनके वादे याद दिलाए और मजबूर करती हैं कि वह राम जी को 14 सालों का वनवास दें और भरत को राज्य गद्दी सौंप दें, महाराज दशरथ को भी मजबूरी में इस बात के लिए यह फैसला लेना पड़ा, जिसके बाद भगवान राम अपनी धर्म पत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ जंगल की तरफ निकल पड़े.

अब उधर जब राजकुमार भरत को यह बात पता चली कि भैया राम, लक्ष्मण और भाभी सीता के साथ चित्रकूट में ठहरे हुए थे तब वो तुरंत ही उनसे मिलने के लिए चित्रकूट की तरफ निकल पड़े, उनके साथ उनका सैन्य दल भी था, क्योंकि वह चाहते थे कि कहीं बड़े भाई श्री राम को कोई परेशानी ना पहुंचा सके, इसलिए उनकी सुरक्षा के लिए वो सैनिकों के साथ जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ चित्रकूट में भगवान राम, लक्ष्मण जी और देवी सीता अपनी कुटिया के बाहर शांति से बैठे हुए थे, तभी उन्हें कहीं से पैरों की आवाज और धूल उड़ती हुई दिखाई दे रही थी, कुछ ही समय में यह आवाज तेज हो गई थी और तभी कोई वनवासी उन्हें यह खबर देते हैं, राजकुमार भरत अपनी सेना के साथ चित्रकूट आ रहे हैं और जल्द ही वह यहां पर पहुंच जाएंगे, भरत के चित्रकूट आने की खबर सुनकर लक्ष्मण जी बहुत गुस्सा हुए के लिए कहा, भगवान लक्ष्मण पानी लेने के लिए घड़ा लेकर सरयू और।

भगवान राम से कहा कि जैसी माता वैसा पुत्र, राजकुमार भरत अपनी सेना के साथ आप पर हमला करने आ रहे हैं, वो ये सोचते हैं कि आप जंगल में अकेले हैं, हमारे पास कोई शक्ति नहीं है तो वो बड़ी ही आसानी से हमें मारकर अयोध्या का राज से हड़प लेंगे, अब ये सब सुनने के बाद मित्रों, के लिए खुद लक्ष्मण को निकल गई, जी हां, लक्ष्मण जी को भगवान राम लक्ष्मण जी को समझाते हुए ये कहते. कि शांत हो जाओ लक्ष्मण, भरत ऐसा बिल्कुल नहीं है, उसका चरित्र बहुत ही अच्छा है, बिल्कुल, बल्कि वो तो सपने में भी अपने भाई के साथ ऐसा नहीं कर सकता, जिसके जवाब में लक्ष्मण जी का गुस्सा शांत नहीं होता और वो कहते हैं कि राजकुमार भरत अपने मकसद में कभी सफल नहीं होंगे और जब तक मैं जिंदा हूं ऐसा नहीं होगा, लेकिन राजकुमार भरत तो अपने बड़े भाई राम से मिलने के लिए आतुर थे, इसी वजह से वो अपनी सेना में सबसे आगे चल रहे थे और उनके साथ तीनों माताएं, कुल गुरु, महाराज जनक और बाकी श्रेष्ठ जन भी थे।

उन सभी को पहुंचने में बहुत रात हो गई थी, जितने लोग प्रभु राम से मिलने आ रहे थे, वे सभी उन्हें वापस अयोध्या ले जाने के लिए आए थे, कुछ ही समय बाद जैसे ही राजकुमार भरत अपने बड़े भैया को देखते हैं, वो उनके पैरों में गिट जाते हैं और उन्हें प्रणाम करते हैं, साथ ही उनकी आंखों से आंसू गिरने लगते हैं, यह देखकर प्रभु राम भी दौड़कर उन्हें ऊपर उठाते हैं और अपने गले से लगा लेते हैं, यह दृश्य देखकर वहां पर मौजूद सभी लोग भावक हो गए थे तब राजकुमार भरत पिता महाराज दशरथ की मौत की खबर बड़े भाई राम को देते हैं और इसी वजह से भगवान राम, माता सीता और छोटा भाई लक्ष्मण बहुत दुखी हुए थे प्रभु राम नदी के तट पर अपने पिता महाराज दशरथ को विधि विधान के साथ श्रद्धांजलि देते हैं, साथ ही अपनी अंजूरी में जल लेकर अर्पण करते हैं।

अब अगले दिन जब भगवान राम, भरत आदि पूरा परिवार, महाराज जनक और सभासद आदि बैठे होते हैं तो भगवान राम अपने भाई भरत से वन आने का मतलब पूछते हैं तब भरत अपनी बात उनके सामने रखते हैं कि वह प्रभु का जंगल में ही राज्य अभिषेक करके उन्हें वापस अयोध्या ले जाने के लिए आए हैं अयोध्या की राज्य संबंधी जिम्मेदारी उन्हें नहीं उठानी होगी, अब महाराज जनक भी राजकुमार भरत के इस विचार का समर्थन करते हैं, लेकिन राम जी ऐसा करने से बिल्कुल मना कर देते हैं, वो अयोध्या लौटने को तैयार ही नहीं हुए क्योंकि वह अपने पिता को दिए वचन की वजह से बंधे हुए थे, राजकुमार भरत, माताएं, सभी लोग प्रभु राम को उसके लिए मनाते हैं, लेकिन बादे से बंधे होने की वजह से श्री राम ऐसा करने से मना करते हैं, जिसके बाद राजकुमार भरत बड़े ही दुखी मन से अयोध्या वापस लौटने के लिए प्रस्थान करने की तैयार. करते हैं, लेकिन जाने से पहले वह भैया राम से कहते हैं, अयोध्या पर बस राम जी का ही अधिकार है और वनवास के 14 सालों का समय ही मैं राजे का कार्यभार संभालूंगा और इस काम को संभालने के लिए आप मुझे आपकी चरण पादुकाएं दे दीजिए, मैं इन्हीं ही राज गद्दी पर रखकर आपको महाराज मानकर आपके प्रतिनिधि के रूप में 14 सालों तक राज्य करूंगा, लेकिन हां, जैसे ही 14 सालों का समय पूरा होगा, आपको दोबारा से अयोध्या लौट आना होगा, वरना मैं अपने प्राण त्याग दूं. अब भरत की बातें सुनकर और उनकी मनस्थिति को देखकर लक्ष्मण जी को उनके लिए किए गए अपने गुस्से पर दुख हो रहा था कि उन्होंने इतने समर्पित भाई पर किस तरह संदेह किया।

उन्हें इन दुखी घटनाओं के घटित होने की वजह समझा, प्रभु राम भी अपने छोटे भाई भरत का प्रेम, समर्पण, सेवा भावना और कर्तव्य देखकर उन्हें प्रेम के साथ अपने गले लगा लेते हैं, वह अपने छोटे भाई राजकुमार भरत को अपनी चरण पादुकाएं देते हैं और साथ ही उनसे यह वादा भी करते हैं कि से ही 14 सालों के वनवास की अवधि पूरी होगी तो वह अयोध्या वापस लौट आएंगे राम जी की बातें सुनकर राजकुमार भरत थोड़े संतुष्ट तो होते हैं और उनकी चरण पादुकाओं को बड़े ही सम्मान के साथ अपने सिर पर रखकर बहुत ही दुखी मन से अयोध्या की तरफ निकल पड़ते हैं बाकी सभी परिवार के लोग भी एक दूसरे से बड़े ही दुखी मन से विदा लेते हैं अब मित्रों बता दें कि भगवान राम भरत लक्ष्मण शत्रुघण चारों भाई चित्रकूट के उस गांव जिसका नाम भारतपुर है पर वनवास में रह रहे थे, इसी जगह पर भरत शत्रुगण ने प्रभु राम को पिता की मृत्यु की खबर दी थी, जहां पर भरत मिलाप हुआ था, वहां पर तीन मंदिर बने हैं, जिसमें राम भरत मिलन, देवी कौशल्या, सीता मिलन और लक्ष्मण शत्रुघण मिलन बताया जाता है, तीनों मंदिरों में आज भी पत्थर की शिला पर चरण चिन्ह देखे जा सकते हैं, लाखों की संख्या में भक्त यहां पहुंचकर चारों भाइयों के दर्शन करते हैं, इसी के साथ आपको देवी सीता और लक्ष्मण जी की एक भयानक रात के बारे में बताते हैं. दरअसल जब रावण का वध करने के बाद प्रभु राम लंका से देवी सीता के साथ अयोध्या लौट रहे थे, उस समय रामनगरी अयोध्या को दीपकों से सजाया जा रहा था और यह दिन दीपावली का था, जिसे आज भाव त्यौहार के रूप में मनाया जाता है, उसी समय देवी सीता को यह याद हुआ कि बनवास जाने से पहले माता सर्यू नदी से वादा किया था कि अगर दोबारा अपने पति और देवर के साथ सही सलामत अयोध्या वापस आऊंगी तो आपकी पूरी विधि विधान से पूजा करूंगी, अब ये सोचकर माता सीता. जी को साथ लेकर रात में सरयू नदी के किनारे पहुंच गई, उन्होंने सरयु की पूजा करने के लिए अपने देवर से पानी लाने नदी में उतर गए, वो घड़े में पानी भर ही रहे थे कि तभी अचानक नदी के अंदर से अघासुर नाम का एक राक्षस निकला जो लक्ष्मण जी को निकलने के लिए आगे बढ़ ही रहा था।

लेकिन तभी देवी सीता ने यह देखकर उन्होंने लक्ष्मण को बचाने निकलने के बाद देवी सीता और लक्ष्मण जी का शरीर पानी की तरह एक तत्व में बदल गया और यह अद्भुत दृश्य हनुमान जी एक पेड़ के पीछे चिपकर देख रहे थे उन्होंने माता सीता और लक्ष्मण जी का जल रूपी सम्मिशरण शरीर एक घड़े में भर लिया और राम जी के सामने सारी घटना सुनाई हनुमान जी की सारी बात सुनने के बाद राम जी मुस्कुराए और उन्होंने बताया कि एक राक्षस को भगवान शिव का वरदान प्राप्त था इसलिए इसका वध मैं भी नहीं कर सकता महादेव के इस वरदान के हिसाब से अघासुर का वध तभी किया जा सकता है जब देवी सीता और लक्ष्मण का शरीर एक होकर किसी तत्व में बदल जाए और हनुमान उस तत्व का इस्तेमाल एक शस्त्र के रूप में करें अब भगवान राम की बातें सुनकर हनुमान जी ने उस घड़े के पानी को गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करके सरयु नदी में बहा दिया नदी में उस पानी के मिलते ही सरयु में आग की लपटें उठने लगी जिसमें जलकर द्वैत्या घस और भस्म हो गया राक्षस के भस्म होते ही नदी ने देवी सीता और लक्ष्मण जी को उनका शरीर वापस कर दिया और इस तरह से उन्हें दोबारा एक नया जीवन मिला, अब आखिर ऐसा क्या हुआ था जो माता सीता को लक्ष्मण जी के लिए खींचनी पड़ी थी सीता रेखा, देखिए मित्रों, बता दें कि लक्ष्मण जी श्री राम के छोटे भाई और शेषना के अवतार थे.

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