कलयुग में श्राप क्यों नहीं लगता – कलयुग का भयानक रूप

कलयुग में श्राप क्यों नहीं लगता?

इस कलयुग में श्राप क्यों नहीं लगता ? सबसे पहले आपको बता दें कि श्राप देना कोई आसान काम नहीं है और यह हर किसी के बस की बात नहीं । जिस तरह एक मिट्टी के घड़े में पानी भरना मूर्खता है । मिट्टी के घड़े में पानी ठहर नहीं सकता उसी तरह उस व्यक्ति का श्राप निरर्थक है जिसने जिसने अपने जीवन काल में कभी भी तपस्या न की हो ।

कलयुग में श्राप देने की योग्यता

तपस्या के बिना कुछ संभव नहीं है । ब्रम्हा जी ने तपस्या से ही इस ब्रम्हांड की रचना की है जिसमे अंसख्य गृह और आकाशगंगाएं हैं । तपस्या के बिना कुछ सार्थक नहीं हो सकता । तपस्या से हर चीज मुमकिन है लेकिन तपस्या हर किसी के बस की बात नहीं होती ।

तपस्या के बिना मुक्ति और ब्रम्ह साक्षात्कार की बात तो छोड़ ही दें क्यूंकि तपस्या के बिना छोटी छोटी चीजें भी प्राप्त नहीं होती । जो भोजन आप खाते हैं उससे शक्ति प्राप्त करना आसान नहीं है । अनाज को पहले सूर्य की किरणों में तपाया जाता है फिर पकाते समय रसोई में तपाया जाता है और फिर पाचन तंत्र द्वारा तीसरी बार तपाया जाता है तब जाकर भोजन से शक्ति प्राप्त होती है ।

अगर आप कच्चा अनाज खाएं तो आप को उससे शक्ति नहीं मिलेगी और अगर आप ठीक प्रकार से पका हुआ भोजन खाएं लेकिन आपका पाचन तंत्र सही नहीं है तब भी आपको उससे वो शक्ति प्राप्त नहीं होगी । भोजन में इतनी शक्ति है कि आपके सारे अंग और यहाँ तक कि आपका दिमाग भी भोजन के जरिये काम करता रहता है जिसे 25 से 30 वाट प्रति घंटे की बिजली चाहिए पड़ती है । लेकिन इसे बिना तपस्या के प्राप्त नहीं किया जा सकता । वैज्ञानिक ऐसी कोई व्यावहारिक ( practical ) मशीन नहीं बना पाए जो अनाज से बिजली बना दे ।

जो लोग इस सत्य को नहीं जानते वो बिना तपस्या किये बड़े बड़े काम करने में यकीन रखते हैं । इस तरह के लोगों का लक्ष्य होता है बिना तपस्या के पैसा कामाना और वे जुआ खेलकर सारा पैसा खो देते हैं । जुआ खेलना एक महापाप भी है इसलिए बाद में जुआ खेलने से संबंधित नर्क भी उन्हें जाना पड़ता है ।

श्राप देने की योग्यता का समीकरण

अर्थात आपको केवल जिन्दा रहने के लिए ही तपस्या करनी होती है फिर बड़े बड़े काम बिना तपस्या के कैसे हो सकते हैं । श्राप देना उन्हीं बड़े कामो में से एक है । आपने जाना कि श्राप देने के लिए तपस्या करने की आवस्यकता होती है । अब बताते हैं कि कलयुग में श्राप क्यों नहीं लगता? इसके लिए आप को जननी होंगी कुछ बातें कलयुग के बारे में ।

कलयुग का भयानक रूप

वैसे तो कलयुग के बारे में आप जानते ही होंगें । कलयुग को कलह का युग कहा गया है । चार युगों का वर्णन सनातन धर्म में हर जगह पाया जाता है । ये चार युग हैं सतयुग , त्रेतायुग , द्वापरयुग और कलयुग । तीन युगों में सात्विक वातावरण होने के कारण साधारण लोग भी भगवान की भक्ति करने लग जाते थे ।

बाकी सब युगों की तरह कलयुग में भक्ति कर पाना आसान नहीं है । यहाँ जन्म लेने वाले लोग जीवन भर कस्ट भोगते हैं । इस युग में राजा अपनी प्रजा का शोषण करते हैं, धर्म ग्रन्थ लुप्त हो जाते हैं । इस युग में बड़े भयंकर युद्ध होते हैं और अकाल पड़ते रहते हैं । प्राकृतिक आपदाएं आती रहती हैं और नयी नयी बीमारियां जन्म लेती हैं जो महामारी बनकर लोगों को प्रताड़ित करती रहती हैं ।

राक्षस हमेसा से ही भगवान को मारना चाहते हैं । राक्षसी स्वभाव वाले लोगों का ही इस युग में बोल बाला होता है और वो स्वयं भगवान बनने का प्रयास करते रहते हैं । भोली भाली जनता ऐसे ढोंगी बाबाओं के चक्कर में पढ़कर कभी भी भगवान के धाम वापस नहीं जा पाती ।

इस युग में मुक्ति के द्वार बंद हो जाते हैं । जीव के कल्याण के मार्ग कहीं नजर नहीं आते और कुछ ही समय के इन्द्रिय सुख को यहाँ सर्वश्रेष्ठ मना जाता है । भगवान को जानने में यहाँ किसी की रूचि नहीं रह जाती और तपस्या के नाम से ये लोग भयभीत हो जाते हैं । दान इनसे दिया नहीं जाता और यज्ञ ये केवल दिखावे के लिए करते हैं इस तरह यह निश्चित ही निम्न गति को प्राप्त करते हैं ।

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कलयुग में जन्म किसे लेना पड़ता है

सतयुग में सब परमहंस हुआ करते थे जिन्हें केवल भगवान के भजन से मतलब होता था । वे धर्म का पालन करने वाले और घनघोर तपस्वी हुआ करते थे और अपने जीवन के अंत तक भगवान के धाम वापिस जाने का प्रयास करते थे ।

कुछ लोग जिन्होंने सतयुग में भगवान का भजन ठीक से नहीं किया वो वापिस भगवान के धाम नहीं जा पाए । ऐसे लोग त्रेता युग में जन्म लेते हैं और फिर से भगवान के धाम वापिस जाने का मौका पाते हैं । इनमे से कुछ लोग तो त्रेता युग में भगवान की भक्ति करके उनके धाम चले जाते हैं परन्तु कुछ लोग त्रेता युग में मनमानी करते हैं और भक्ति करने में रूचि नहीं दिखाते ।

इस तरह के लोग द्वापर युग में फिर से जन्म लेते हैं । कुछ लोग द्वापर युग में सही से भक्ति करके जीवन को सफल बना पाते हैं । वहीं दूसरी और कुछ बदमाश लोग जो शास्त्रों को नहीं मानते और अपने मन से ही कर्म करते रहते हैं वे द्वापर युग में भी भक्ति नहीं करते । ऐसे लोगों को जबरदस्ती कलयुग में जन्म दिया जाता है ।

कलयुग में श्राप इसलिए नहीं लगता

कलयुग के बारे में पढ़कर अभी तक आप इस युग के लोगों की हालत जान ही गए होंगे । सत्य, दया, पवित्रता और तप ये चार धर्म के स्तंभ हैं । कलयुग के लोग इन सद्गुणों का आचरण नहीं करते अपितु इसके विपरीत जुआ खेलते हैं, हिंसा, व्यभिचार और नशा करते हैं । केवल उस तपस्वी का श्राप लगता है जिसने जीवन भर धर्म का पालन किया हो ।

जिस तरह तपाया हुआ मिट्टी का घड़ा पानी रोक लेता है और साधारण मिट्टी का घड़ा पानी में बह जाता है ठीक उसी तरह धर्म परायण तपस्वियों के श्राप अटल होते हैं परन्तु भोगियों के श्राप नहीं लगते । कलयुग में धर्म का पालन करने वाले तपस्वी बचे ही नहीं हैं और जो हैं वो सामने नहीं आते । इसलिए कलयुग में श्राप नहीं लगता ।

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