जरासंध को किसने मारा

जरासंध का वध महाबली भीम ने किया था । अभी तक हमने पड़ा कि किस तरह मयासुर ने इंद्रप्रस्थ का निर्माण किया । हमने पड़ा कि किस तरह इंद्रप्रस्थ में आये देवर्षि नारद ने महाराज युधिष्ठिर को यह बताया था कि उनके पिता स्वर्ग में हैं और उन्होंने युधिष्ठिर के लिए एक राजसूय यज्ञ करने की आज्ञा दी है । इस पोस्ट में हम आगे की कहानी पड़ेंगे, अगर आपने पिछले पोस्ट नहीं पढ़ा है तो यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं – इंद्रप्रस्थ का निर्माण किसने किया

तब महाराज युधिष्ठिर ने अपने मंत्रियों से इस बारे में विचार विमर्श किया और बाद में यह निर्णय निकाला गया कि महाराज युधिष्ठिर को राजसूय यज्ञ करना चाहिए क्यूंकि वे इस पृथ्वी एक छात्र राजा बनने के सर्वथा योग्य हैं । आपको बता दें कि जो व्यक्ति राजसूय यज्ञ संपन्न करना चाहता है उसे पृथ्वी का एक छत्र सम्राट होना अनिवार्य हो जाता है ।

इसी तरह की धार्मिक पोस्ट पड़ते रहने के लिए हमारा व्हाट्सप्प ग्रुप ज्वाइन करें । ग्रुप ज्वाइन करने के लिए आगे क्लिक करें – WhatsappGroup

जरासंध की कहानी

मंत्रियों से सलाह लेने के बाद महाराज युधिष्ठिर ने सोचा कि भगवान श्री कृष्ण ही इस समस्या का समाधान कर सकते हैं । भगवान श्री कृष्ण के पास महाराज युधिष्ठिर के एक दूत पहुंचे जिन्होंने सारी बा उन्हें वतायी और भगवान स्वयं ही इंद्रप्रस्थ चले आये । भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा था कि वे राजसूय यज्ञ करने के योग्य हैं और उन्हें यह यज्ञ करना चाहिए ।

भगवान श्री कृष्ण ने आगे बताया कि इस समय पृथ्वी पर जरासंध नाम का राजा सबसे शक्तिशाली है और राजसूय यज्ञ करने के लिए पहले उसे हराना होगा । शिव जी की तपस्या करके वह राजा इतना अधिक शक्तिशाली हो गया है कि अगर उससे 300 वर्षों तक युद्ध किया जाए तब भी उसे जीता नहीं जा सकता ।

आपको बता दें कि जिन पांडवों ने महाभारत का महाविशाल युद्ध केवल 18 दिनों में जीत लिया था उनके लिए भगवान कह रहे हैं कि वे जरासंध को 300 वर्षों में भी नहीं जीत पाएंगे । भगवान श्री कृष्ण ने महाराज युधिष्ठिर से कहा था कि जरासंध ने अभी तक कुल 86 राजाओं को अपनी कैद में रखा हुआ है और अगर युधिष्ठिर ऐसी अवस्था में राजसूय यज्ञ करवाएंगे तो उनका यज्ञ सफल नहीं होगा ।

भगवान ने कहा कि पहले महाराज युधिष्ठिर को जरासंध का वध करके उसकी कैद से उन 86 राजाओं को मुक्त करना होगा और फिर पृथ्वी के बाकी बचे हुए राजाओं को जीतकर चक्रवर्ती सम्राट बनना होगा तब उनका राजसूय यज्ञ सफल होगा । महाराज युधिष्ठिर ने तब कहा कि सबसे पहले उस क्रूर और अधर्मी राजा जरासंध को मारना उचित होगा लेकिन उसे मरेगा कौन?

भीम ने कहा कि वे अर्जुन और भगवान श्री कृष्ण के साथ जाकर जरासंध को मार ुद्ध में मार देंगे । युधष्ठिर ने कहा कि वे अपने स्वार्थ के लिए अपने प्रिय भाइयों को मौत के मुँह में नहीं भेज सकते । तब अर्जुन ने कहा कि क्षत्रिय का कर्तव्य है धर्म के लिए युद्ध करना और अगर वे उन राजाओं को बचा लेते हैं तो उन्हें उनके क्षत्रिय होने पर गर्व होगा ।

इसी तरह भगवान श्री कृष्ण ने भी कहा कि अगर धर्म के लिए लड़ने का मौका मिले तो तुरंत ही आगे आकर अपने पूरे प्रयास से जीतने की कोशिस करनी चाहिए । भगवान ने कहा कि अगर ऐसे युद्ध में जीत गए तो इस लोक की प्राप्ति होती है और अगर हार गए तो परलोक की प्राप्ति होती है ।

युधिष्ठिर मान गए और फिर भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि जरासंध को इतनी शक्ति कहाँ से प्राप्त हुयी । भगवान ने कहा कि कुछ समय पहले मगध देश में बृहद्रथ नाम के एक राजा थे । बहुत से यज्ञ करवाने के बाद भी उनके यहाँ कोई संतान नहीं हो रही थी ।

एक दिन राजा ब्रहद्रथ को खबर मिली कि उनके राज्य में महात्मा चण्ड कौशिक आये हुए हैं । राजा तुरंत ही महात्मा के पास पहुंचे और एक पुत्र की कामना की । महात्मा ने उन्हें एक फल दिया और कहा कि इसे अपनी पत्नी को खिला देना और तुम्हे पुत्र प्राप्त हो जायेगा ।

राजा ने ऐसा ही किया और आधा आधा फल अपनी दोनों पत्नियों को दे दिया । दरअसल राजा ने शादी के वक्त अपनी दोनों पत्निओं से वादा किया था कि वे दोनों को सामान प्रेम करेंगे और इस वक्त उन्हें अपना वादा निभाने के लिए फल के दो हिस्से करने पड़ गए । महात्मा ने यह तो कहा नहीं था कि आधा फल ही अपनी पत्नी को खिलाना परन्तु राजा ने ऐसा ही किया और इस वजह से राजा बृहद्रथ की दोनों पत्नियों को पुत्र प्राप्त तो हुए लेकिन आधे आधे ।

एक पुत्र का आधा सर था और आधा शरीर । इसी तरह दूसरे पुत्र का भी आधा ही सर था और आधा शरीर । दोनों राणियां इस तरह के पुत्र देख कर दंग रह गयीं और उन्होंने दोनों पुत्रों को फेक दिया । उस राज्य में एक जरा नाम की राक्षसी रहती थी और जब जरा राक्षसी ने इन दोनों आधे आधे शरीर वाले पुत्रों को खाने के लिए उठाया तो वे आपस में जुड़ गए और उस बालक में जान आ गयी ।

वह इतने जोर से रोने लगा कि उसकी आवाज राजा के महल तक पहुंची । जरा ने सोचा कि यह तो छोटा सा बालक है इसको मुझे राजा को लौटा देना चाहिए । राक्षसों के पास मायावी विद्या होती है और उस विद्या के इस्तेमाल से जरा समझ गयी थी कि यह राजा बृहद्रथ का ही पुत्र है ।

जरा ने एक अपनी मायावी विद्या से एक सुंदर सा रूप धारण किया और राजा बृहद्रथ को वह पुत्र लौटा दिया । उस बालक को जरा नाम की राक्षसी ने जोड़ा था इसलिए उनका नाम जरासंध रखा गया । एक दिन महात्मा चण्ड कौशिक मगध देश आये और उन्होंने राजा बृहद्रथ को बताय कि तुम्हारा पुत्र बहुत अधिक शक्तिशाली होगा । इसको देवता तक नहीं हरा पाएंगे और इसकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी इसको दर्शन देंगे ।

भगवान श्री कृष्ण ने जरासंध के जन्म की कहानी बताकर कहा कि आमने सामने लड़ने की जगह जरासंध को कुस्ती में हराना चाहिए । इसके बाद महाराज युधिष्ठिर की आज्ञा लेकर भगवान श्री कृष्ण, अर्जुन और भीम जरासंध के यहाँ गए और जाने से पहले सब ने साधू भेष धारण कर लिया । जरासंध ने उनका बहुत ही अच्छे से स्वागत किया था लेकिन वह बहुत बुद्धिमान था और एक ही दृष्टि में समझ गया था कि ये ब्राह्मण तो नहीं हैं ।

जरासंध के मन की बात जानकार भगवान श्री कृष्ण ने उसे युद्ध के लिए चुनौती दे दी । भगवान ने कहा कि वे तीनो क्षत्रिय हैं और जरासंध की कैद से उन समस्त राजाओं को छुड़ाने के लिए आये हैं । भगवान ने आगे कहा कि या तो जरासंध उन राजाओं को छोड़ दे या फिर उनसे युद्ध करने के लिए तैयार हो जाए ।

तब जरासंध ने कहा कि वह युद्ध करना पसंद करेगा । जरासंध ने कहा कि अर्जुन और कृष्ण उसे शरीर से काम बलवान लगते हैं इसलिए वह भीम सेन के साथ कुस्ती लड़ना पसंद करेगा । इसके बाद भीम सेन और जरासंध का युद्ध पूरे 13 दिन तक चलता रहा और चौदवें दिन जरासंध थक गया तब भीम ने उसके दो टुकड़े करके दायां हिस्सा दाएं तरफ और बायां हिस्सा बाएं तरफ फेक दिया । कुछ ही समय में जरासंध के दोनों टुकड़े फिर से जुड़ गए ।

भीम ने फिर से दो टुकड़े कर दिए लेकिन वे फिर से जुड़ गए । अब भीम ने आशा भरी नजरों से भगवान कृष्ण की और देखा और भगवान ने एक लकड़ी की तीली उठाकर उनको इशारा किया । भगवान ने उस तीली को बीच में से फाड़ दिया और उसका दायां हिस्सा बाएं तरफ फेका और बायां हिस्सा दाएं तरफ।

भीम ने भी जरासंध के दो टुकड़े करके विपरीत दिशाओं में फेक दिए और जरासंध मारा गया । इस प्रकार तीनों जरासंध की कैद से सभी 86 राजाओं को छुड़ाकर वापिस इंद्रप्रस्थ आ गए थे और वापिस आते आते पांडवों ने जरासंध के पुत्र सहदेव को मगध का राजा बना दिया था ।

राजसूय यज्ञ करने के लिए महाराज युधिष्ठिर का चक्रवर्ती सम्राट बनना अनिवार्य था जिसके लिए अनिवार्य था पृथ्वी के सभी राजाओं के द्वारा महाराज युधिष्ठिर का अधिपत्य स्वीकार किया जाए । अर्जुन और बाकी पांडवों ने यह जिम्मेमदारी अपने ऊपर ली और महाराज युधिष्ठिर की आज्ञा लेकर विश्व विजयी बनने के लिए निकल पड़े ।

अभी के लिए इतना ही आगे की कहानी जानेगे अगली पोस्ट में । अगली पोस्ट की जानकारी पाने के लिए हमारा व्हाट्सप्प ग्रुप ज्वाइन करें । ग्रुप ज्वाइन करने के लिए यहाँ क्लिक करें – WhatsappGroup