गंगोत्री धाम के अनसुने रहस्य – यह कथाएं आपको हैरान कर देंगी!गंगोत्री के पौराणिक रहस्य

खोले जाते हैं। शरद ऋतु के समय मां गंगा की मूर्ति गंगोत्री से 18 किलोमीटर दूर स्थित मुखबा नामक गांव में की जाती है। जिस भी श्रद्धालु को सर्दी के मौसम में मां गंगा के दर्शन करने हों, वे इस मुखबा गांव में जाकर कर सकते हैं। गंगोत्री से लगभग 50 किलोमीटर पहले गंगनानी नामक एक कस्बा पडता है। इस स्थान पर गर्मपानी का कुंड है। इस कुंड के बारे में यह बात बडी ही आश्चर्यजनक है कि इस गर्म पानी का स्रोत क्या है, यह आज तक कोई नहीं जान पाया है। मित्रों, माना जाता है कि यह भी मां गंगा का ही एक चमत्कार है और यह उनका ही एक स्वरूप है। गंगोत्री के मंदिर से पहले बाल शिव का एक प्राचीन मंदिर भी है। इस मंदिर को बाल कंडार मंदिर भी कहा जाता है। यह पूरे गंगोत्री धाम का सबसे पहला पूजा स्थल है।

गंगोत्री के आसपास के इलाके में अल्पाइन के शंक्वाकार वृक्षों के वन और हरे भरे घास से भरे मैदान देखने को भी मिलते हैं। इन वन क्षेत्र को सरकार द्वारा गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया जा चुका है। इसका विस्तार भारत चीन सीमा तक फैला हुआ है। गंगोत्री आए दर्शनाभिलाषी इसके पास वाले ज्ञानेश्वर मंदिर एवं एकादश रूद्र मंदिर के भी दर्शन कर सकते हैं। गंगोत्री से ही एक छोटा सा रास्ता पांडव गुफा की ओर गया हुआ है। यह भारत के सबसे बड़े महाकाव्य महाभारत में वर्णित पांडवों का आराधना स्थल रहा है। दोस्तो, गंगा हमारे देश की सबसे पवित्र नदी है, जिसके जल को अमृत के समान माना गया है। भारत में लगभग हर धर्म के लोग गंगा को बड़े ही आदर भाव से देखते हैं एवं उसकी पूजा भी करते हैं।

सनातन संस्कृति में गंगा को नदी तट माना गया है यानि कि नदियों में नदी पृथ्वी की सबसे पवित्र नदी है। इसीलिए तो हमारे यहां पर लोग गीतों में भी गाते हैं कि गंगा तेरा पानी अमृत झरझर बहता जाए। युग युग से इस देश की धरती तुझसे जीवन पाए। दोस्तों हिन्दुओं में किसी भी भगवान, देवता आदि की पूजा क्यों ना हो बिना गंगाजल के वह संपन्न हो ही नहीं सकती। संक्षिप्त में कहा जाए तो भारतीय संस्कृति में मानव के जीवन से लेकर मृत्यु तक गंगाजल उसके संपूर्ण जीवन से जुड़ा हुआ है। यहां तक कि मृत्यु के बाद भी उसकी अस्थियों को गंगा में ही बहाया जाता है ताकि मृत व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति हो सके। मां गंगा की उत्पत्ति और उनके जल में स्नान से मोक्ष पाने के पीछे एक पौराणिक कथा है। आइये अब हम जानते हैं उस कथा के बारे में। गंगोत्री से जुड़ी पौराणिक कथा मित्रों, पौराणिक कथाओं के अनुसार सतयुग काल में एक महान प्रतापी राजा सगर हुआ करते थे।

राजा सगर के 60,001 पुत्र थे और उनके यह पुत्र बहुत ही क्रूर प्रवत्ति के थे। राजा सगर उनके पुत्रों के इस व्यवहार से बहुत परेशान रहते थे। एक दिन महर्षि नारद ने उन्हें समस्या का हल सोच आया और कहा कि राजन्! आप एक अश्वमेध यज्ञ करवाइए, उससे आपके पुत्रों को सद्बुद्धि प्राप्त हो जाएगी। राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन करवाया। यज्ञ शुरू ही हुआ था कि इसका प्रभाव देखकर इंद्र का मन घबराने लगा। इंद्र को यह डर सताने लगा कि यदि यह अश्वमेध यज्ञ सफलता पूर्वक संपन्न हो गया तो कहीं राजा सगर अपने पुत्रों के साथ मिलकर इंद्रलोक पर आक्रमण न कर दें। इंद्र का सिंघासन डोलने लगा। इससे घबराकर इंद्र ने यज्ञ का घोड़ा भगवान विष्णु के अवतार कहे जाने वाले कपिल मुनि के आश्रम में ले जाकर बांध दिया। इसके बाद जब राजा सगर के 60,000 पुत्र घोड़े को ढूंढते हुए कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे तो आश्रम में घोड़े को बंधा देख वे सब कपिल मुनि को अपशब्द कहने लगे।

इससे कपिल मुनि का ध्यान भंग हो गया और कपिल मुनि को अत्यधिक क्रोध आ गया। क्रोधित कपिल मुनि के ने कहा वैसे ही सगर के 60,000 पुत्रों पर पड़ी वह सबके सब उसी जगह पर जलकर भस्म हो गए। इसके बाद राजा सगर का आखरी पुत्र जब अपने 60,000 भाइयों को ढूंढता हुआ कपिल मुनि के आश्रम पहुंचा तो अपने भाइयों की राख और कपिल मुनि को क्रोध में देखकर वह घबरा गया। डर से कांपते हुए वह कपिल मुनि के चरणों में गिर गया और उनसे क्षमा याचना करने लगा। जब कपिल मुनि का क्रोध शांत हुआ तो उसने उनसे अपने भाइयों की मुक्ति का उपाय पूछा। कपिल मुनि ने उपाय बताते हुए कहा कि भविष्य में तुम्हारे खानदान में राजा भागीरथ नाम का एक राजा होगा और वह अपनी कठिन तपस्या से मां गंगा को पृथ्वी पर लाएगा। जब मां गंगा यहां से गुजरेंगी तो उनके जल के स्पर्श मात्र से ही तुम्हारे भाइयों का कल्याण हो जाएगा। आगे चलकर मित्रों, जब राजा भागीरथ। ने अपनी तपस्या के माध्यम से मां गंगा को पृथ्वी पर आने का आग्रह किया तो भागीरथ के आग्रह पर गंगा धरती पर आने के लिए तैयार तो हो गई परंतु उनका वेग या गति इतनी तेज थी कि अगर वह सीधा पृथ्वी पर उतरती हैं, वे अपने प्रचंड वेग के कारण पृथ्वी का सीना चीरते हुए सीधे पाताल लोक में प्रवेश कर जाती हैं।

जब भागीरथ ने इसका उपाय खोजा तो उन्हें पता चला कि मां गंगा के वेग को भगवान शिव के सिवाय और कोई भी नियंत्रित नहीं कर सकता। इसके बाद भागीरथ ने भगवान शिव की तपस्या आरंभ कर दी और उन्हें अपने कठोर तप से प्रसन्न भी किया। भगवान शिव ने धरती पर संपूर्ण गंगा को अपनी जटाओं में उतार लिया और अपनी जटाओं की एक लट खोलकर उससे गंगाजी को पृथ्वी पर उतार दिया, जिससे पृथ्वीवासियों को मां गंगा के प्रचंड रूप की जगह सौम्य रूप प्राप्त हो सका। जिस जगह पर मां गंगा भगवान शिव की लट के सहारे पृथ्वी पर उतरती थी, उस स्थान को ही आगे चलकर गंगोत्री कहा जाने लगा। गंगा हिमालय के सबसे बड़े ग्लेशियर्स में से एक गोमुख ग्लेशियर से निकलती हैं। गोमुख गंगोत्री से 18 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है। यह ग्लेशियर 30 किलोमीटर लंबा और चार किलोमीटर चौड़ा है। गोमुख तक का रास्ता बहुत ही कठिन है इसलिए बहुत ही कम मात्रा में श्रद्धालु यहां तक पहुंच पाते हैं।

भारत में गंगा नदी इस गोमुख से निकलकर अलग अलग राज्यों से बहती हुई बंगाल की खाड़ी में जाकर समुद्र से मिल जाती है। गोमुख से लेकर देवप्रयाग तक इस नदी को भागीरथ के नाम से भी जाना जाता है। देवप्रयाग में जब इस भागीरथी के साथ अन्य छह देव नदियां आकर मिलती हैं और आगे जब यह सब धारा बहती है तो इसे गंगा कहा जाता है। इन अन्य छह नदियों के नाम हैं जहान्वी, भेल, गंगा, मंदाकनी, ऋषि, गंगा, अलकनंदा और सरस्वती। दोस्तों गंगा नदी धार्मिक रूप से पवित्र तो है ही साथ ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी यह बहुत अद्भुत है। गंगा के पानी में बैक्टीरियोफेज नामक एक कीटाणु पाया जाता है जो शरीर के लिए हानिकारक छोटे छोटे बैक्टीरिया और कीटाणुओं को पनपने नहीं देता। इसलिए गंगा का पानी कभी भी किसी पात्र में भरकर रखने पर खराब नहीं होता। इसके अलावा पानी में एंटी एजिंग प्रॉपर्टी भी पाई जाती है, जो हमारे शरीर को डिटॉक्स करने में काफी मदद करता है।

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  1. बहुत सुंदर सदेंश अति महत्वपूर्ण ज्ञानवर्धक सदेंश। बहुत बहुत धन्यवाद और आभार और हार्दिक अभिनंदन। डॉ.गोपाल कृष्ण मेहता।

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