भागवत कथा की शुरुआत कैसे हुई

भागवत कथा की शुरुआत कैसे हुई

सबसे पहले भागवत कथा की शुरुआत चारों कुमारों ने नारद ने के दुख का कारण पूछा । देवर्षि नारद बद्रिकाश्रम जा रहे थे तभी उनकी ब्रह्मा के चारों कुमारों से भेंट हुई । चारों कुमारों ने नारद ने के दुख का कारण पूछा । नारद जी ने बताया कि वे पृथ्वी पर गए और वहां उन्होंने भारत भूमि पर जाकर सभी तीर्थों का भ्रमण किया ।

नारद मुनि पुष्कर, प्रयाग, नाशिक, हरिद्वार इत्यादि जगहों पर गए लेकिन उनके मन को कहीं शांति नहीं मिली इसलिए वे वृंदावन गए । उन्होंने देखा कि वहां पर एक स्त्री रो रहीं थीं और उनके दो बच्चे भी वहां पड़े हुए थे । नारद जी को स्त्री ने बताया कि वे भक्ति देवी हैं ।

भक्ति देवी ने बताया कि उनके पुत्र वृद्ध हो गए हैं और रोगों से पीड़ित हैं इसलिए वे दुखी हैं । भक्ति देवी ने कहा कि महाराज परीक्षित ने कलयुग को बिना सोचे समझे स्थान क्यों दे दिया । कलयुग के कारण ही सब दुखी हैं और इसलिए नारद मुनि को इसलिए कहीं शांति नहीं मिली ।

नारद मुनि ने बताया कि परीक्षित महाराज जानते थे कि जो फल तपस्या से, समाधि से नहीं मिल सकता वही फल कलयुग में भगवान कृष्ण के नाम कीर्तन से मिल सकता है इसलिए उन्होंने कलयुग को जगह दी ।

चार कुमारों ने कहा कि अगर देवर्षि नारद भागवत को सुनेगे या सुनाएंगे तब दुख दूर हो जाएगा

नारद मुनि ने कहा कि कलयुग के जैसा कोई युग नहीं है इस युग में तुम्हें सभी घरों में स्थापित करूंगा । इसके बाद नारद मुनि ने बहुत कोशिश की लेकिन वे भक्ति देवी के पुत्रों की रक्षा नहीं कर पाए ।

उसके बाद आकाशवाणी हुई कि साधु संग करके सत्कर्म कीजिए जिससे भक्ति देवी के पुत्रों की रक्षा हो सकेगी । नारद मुनि इसी प्रकार बद्रिकाश्रम जा रहे थे तभी उनकी भेंट चार कुमारों से हो गई । चार कुमारों ने बताया कि भगवत का पाठ कीजिए तभी भक्ति देवी के दुखों का अंत हो सकेगा ।

नारद मुनि को चार कुमारों ने बताया कि सभी वेद शास्त्रों की रचना करके, श्रीमद भगवद गीता की रचना करके जब दुखी थे तब आप ही ने उन्हें जाकर श्रीमद भागवत सुनकर उनके दुख को दूर किया था और आज आप ही उसे भूल गए हैं ।

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चार कुमारों ने कहा कि अगर देवर्षि नारद भागवत को सुनेगे या सुनाएंगे तब दुख दूर हो जाएगा । इसके बाद नारद जी ने चारों कुमारों से हरिद्वार धाम में आकर भागवत कथा सुनी । वहां पर सभी ऋषि मुनि आए और नारद मुनि के साथ उन्होंने भागवत कथा सुनी ।

भगवान ने उद्धव को भागवत सुनाई और कहा कि में अपनी सारी शक्ति भागवत में रखता हूं

जीव इस संसार में तभी तक भटकता रहता है जब तक उसके कानों में सुकदेव गोस्वामी के द्वारा बोली गई भागवत कथा नहीं पड़ती । व्यक्ति के शरीर में तभी तक पाप रह सकता है जब तक वह सम्यक रूप से मन लगाकर भागवत कथा नहीं सुना ।

इतनी पवित्रता किसी तीर्थ में नहीं है जो भागवत सुनने से प्राप्त होती है क्योंकि तीर्थ यात्रा से पाप तो खत्म हो जाते हैं लेकिन पाप की प्रवत्ति खत्म नहीं होती । लेकिन भागवत कथा सुनने से पाप करने की प्रवत्ति भी खत्म हो जाती है ।

नारद मुनि ने पूछा कि भगवत कथा में इतना समर्थ कहां से आ गई । सूत गोस्वामी ने कहा कि जब भगवान अपने धाम को जाने लगे तब उद्धव जी बड़े दुखी हो गए । भगवान ने उद्धव को भागवत सुनाई और कहा कि में अपनी सारी शक्ति भागवत में रखता हूं इसलिए इसे सुनने से या पढ़ने से सारे पाप खत्म हो जाते हैं ।

जैसे सोनकादिक भागवत कथा सुना रहे थे तभी भक्ति देवी भी वहां आ गईं । सोनकादिक ने कहा कि आप भक्तों के हृदय में जाकर निवास करें । इसके बाद नारद मुनि ने पूछा कि इस कथा से किन किन लोगों का कल्याण हो सकता है।

भागवत कथा से उसका उद्धार हो सकता है

सोनकादिक ने कहा कि हर प्रकार के लोग चाहे कोई कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो । उन्होंने एक ब्रह्मण का उदाहरण देते हुए कहा कि एक ब्राह्मण था जो बहुत ही निर्धन था और उसके पास कोई संतान नहीं थी । एक दिन उसे एक सन्यासी मिले और उन्होंने उसे एक फल दिया ।

उस ब्राह्मण ने आकर वह फल अपनी पत्नी को दे दिया और कहा कि उससे खाने से एक पुत्र प्राप्त हो जाएगा । ब्राह्मण की पत्नी ने वह फल गाय को खिला दिया और उसकी बहन का पुत्र लेकर उसने अपने ब्राह्मण पति को दे दिया ।

उसका नाम धुंधकारी था और गाय से जो पुत्र प्राप्त हुआ उनका नाम गोकर्ण था । धुंधकारी ने इतना उत्पात मचाया कि ब्रह्मण घर को छोड़ कर चले गए । धुंधकारी अपने घर में लाकर पांच वैश्याओं को ले आया । वैश्याओं ने एक रात को धुंधकारी को मार दिया और सारा धन कर चली गई ।

जब गोकर्ण वापिस आए तो उन्होंने समझ लिया कि धुंधकारी को प्रेत योनि मिली है । गोकर्ण जी ने गया में पिंडदान किया लेकिन इससे उनके भाई का उद्धार नहीं हुआ । इसके बाद सूर्य देव ने गोकर्ण जी को बताया कि आप भागवत कथा सुनाइए जिससे धुंधकारी का उद्धार हो जायेगा ।

गोकर्ण जी पहले से ही भागवत कथा जानते थे और उन्होंने अपने भाई को कथा सुनाई जिससे धुंधकारी का उद्धार हो गया और सातों दिन भागवत कथा सुनने के बाद धुंधकारी को भगवान का विमान लेने के लिए आया ।

भागवत कथा के वक्ता की योग्यता

वक्ता भगवान विष्णु का भक्त होना चाहिए । वेद शास्त्र का जाता होना चाहिए और समझाने में निपुण होना चाहिए । वह पाखंडी नहीं होना चाहिए । इसके बाद भगवान से प्रार्थना करके भागवत कथा सुननी चाहिए और बड़ी निष्ठा के साथ कथा सुननी चाहिए । धुंधकारी का उदाहरण सुनकर नारद मुनि ने कथा सुना प्रारंभ किया ।

सुकदेव गोस्वामी ने कथा शुरू करने से पहले कहा कि संपूर्ण लोकों में यह रस नहीं है । यह रस स्वर्ग में नहीं है, ब्रह्मा के लोक में नही। है, कैलाश में नहीं है और बैकुंठ में भी नहीं है इसलिए पृथ्वी पर रहने वाले लोगों आप इस कथा को सुनिए । कथा में भगवान के सभी पार्षद उपस्थित थे जैसे कि बलि, अर्जुन ।