सरस्वती देवी का ऐसा मंदिर जहां स्तंभों से निकलते हैं संगीत के सुर, मिलता है महाज्ञान

आंध्र प्रदेश में एक गांव है। बस इस गांव में गोदावरी के तट पर स्थित है। ज्ञान की देवी देवी सरस्वती का प्राचीन मंदिर बासर स्थित इस मंदिर के विषय में प्रचलित मान्यता है कि महाभारत के लेखक वेदव्यास जब मानसिक उलझनों से उलझे हुए थे तब शांति के लिए तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े। अपने मुनियों सहित उत्तर भारत की तीर्थ यात्राएं कर 62 पहुंचे। उन्होंने गोदावरी नदी के तट को देखा और नदी के तट की सुंदरता को देखकर वह कुछ देर वहीं ठहर गए। यहीं पर उन्हें अपने ज्ञान। अनुभूति भी हुई यह तो सर्व व्याप्त है कि मां सरस्वती हिंदू धर्म की प्रमुख देवियों में से एक है। उन्हें ब्रह्मदेव की मानस पुत्री कहा गया है जो विद्या की देवी भी मानी गई है। उनका दूसरा नाम शतरूपा भी है।

सरस्वती जी को कई और नामों से भी जाना जाता है। वाणी वाग्देवी, भारती, शारदा, वागेश्वरी इत्यादि यह बिना बाद अंतत परा शुक्ल एवं श्वेत वस्त्र धारिणी तथा श्वेत पद्मासना कहलाती है। ज्ञान एवं बुद्धि संगीत ललित कला वाणी रचनात्मक कार्य सब की देवी मां सरस्वती ही तो महाकाली महासरस्वती तथा महालक्ष्मी मिलकर महा देवियों के समूह का निर्माण करती है। प्राचीन कथाओं के अनुसार यहां मां सरस्वती के मंदिर से थोड़ी दूर स्थित दत्त मंदिर है। जहां से होते हुए गोदावरी नदी से एक सुरंग जाया करती थी। इसी सुरंग की मदद से उस समय के राजा महाराजा पूजा के लिए जाया करते थे।

कथाओं के अनुसार वाल्मीकि ऋषि ने यहां।मां सरस्वती से उनका आशीर्वाद प्राप्त किया और उसी के पश्चात यही रामायण के लेखन की शुरुआत भी की देवी सरस्वती वेद माता के नाम से विख्यात है। चारों वेद के स्वरूप माने जाते हैं। कहते हैं कि महाकवि कालिदास, भद्राचार्य, धूप, दीप आदि मंदबुद्धि लोग सरस्वती उपासना के सहारे उच्च कोटि के विद्वान बने थे। इस मंदिर की खासियत है कि यहां केंद्रीय प्रतिमा सरस्वती जी की स्थापित है और इतना ही नहीं यहां लक्ष्मी जी को भी विराजमान किया गया है। इस मंदिर में सरस्वती जी की बहुत ही भव्य प्रतिमा विराजमान है और यह प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में है।

इसकी ऊंचाई 4 फुट है। इस मंदिर की सबसे खास बात जो सभी भक्तों का ध्यान अपनी ओर खींचती है, वह की मंदिर के एकदम से संगीत के सातों स्वर सुनाई देते हैं। अगर आप ध्यान से कान लगाकर सुनेंगे तो आपको ध्वनि साफ सुनाई देगी। यहां की धार्मिक नीति भी प्रचलित है जिसे अक्षर आराधना कहा जाता है।अक्षर आराधना में बच्चों को अपनी विद्या प्रारंभ करने से पहले अक्षरा अभिषेक कराने के लिए यहां लाया जाता है। मतलब बच्चे के जीवन के पहले अक्षर यहां लिखवाए जाते हैं। इसके बाद प्रसाद के रूप में हल्दी का लेप बांटा जाता है। अब उम्मीद करते हैं दोस्तों मां सरस्वती की यह कहानी आपको पसंद आई होगी।

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