श्री राम के हाथों ही क्यों मारा गया रावण ?

पाप और अधर्म का आखिरी समय अब आ गया है। काल ने रावण के लिए अपने दरवाजे खोल लिए हैं। लंका के शूरवीरों। आज हम सब समय के उस मोड़ पर खड़े हैं जहां या तो राक्षस जाति का नाश होगा या फिर आज के बाद धरती का हर एक प्राणी हमारे नाम से थर थर कांप होगा। और मुझे यकीन है हम ही विजय प्राप्त करेंगे। उस वन में भटकने वाले राम की सेना में इतना पराक्रम नहीं है कि वह लंकेश को पराजित कर सके।

आज मैं धरती माता को साक्षी मानकर यह कहता हूं कि आज के महा युद्ध में देवता, किन्नर, गंधर्व और तीनों लोकों के प्राणी राम का रामत्व देखेंगे। आज ऐसा युद्ध होगा कि हर युग में राम के पराक्रम की चर्चा होगी। युद्ध के लिए दोनों पक्ष के लोग पूरी तरह से तैयार थे। जहां रावण की सेना हाथ में तलवार और अपने राजकुमारों की मौत के प्रतिशोध की आग सीने में लिए राज महल से निकल रही थी, वहीं दूसरी तरफ वानर सेना हाथों में गदा और हृदय में माता सीता के साथ हुए अन्याय का क्रोध लिए युद्ध के लिए तैयार खड़े थे। स्वार्थी विश्राम के पास इतना मायावी रथ कहां से आया?

इसमें भी मुझे देवताओं का हाथ लग रहा है। हां महाराज! ये रथ तो देवराज इंद्र का है। इंद्र की इतनी हिम्मत कि वो मेरे खिलाफ जाकर राम की मदद करे। बस कुछ देर की और प्रतीक्षा है। एक बार में रामकांत कर दूं। फिर इस इंद्र से निपटता हूं। उधार के रथ पर बैठ कर बहुत गुमान कर रहा है न तू कुछ भी कर ले। वनवासी राम से रावण कभी नहीं बन सकता। इसलिए शीश झुकाकर बात कर शीश झुकाने का मौका तो मैंने तुमको दिया था। रावण लेकिन तुमने तो अपने खोखले अहंकार का चोला ओढ़ रखा है।

आज जब तक तुम्हारी सांसें नहीं रुक जाती, तुमको अपनी गलती का एहसास नहीं होगा। इसलिए अब तुम्हारा शीश काटना और भी ज्यादा जरूरी हो गया है। अरे वनवासी, मेरे भाइयों और पुत्रों को मारकर तू खुद को बहुत बड़ा योद्धा समझ रहा है क्या? देख, तेरे सामने कौन खड़ा है? रावण वो रावण जिसका नाम सुनकर तीनों लोकों में लोग थर थर कांपते हैं। वो रावण जिसने शनि को अपना बंदी बनाया। अभी तक तूने जिन को भी मौत की नींद सुलाया है, मैं उनकी तरह नहीं हूं।

तूने छल से बालि का वध किया। मेरे भाई कुम्भकरण और पुत्र मेघनाथ को मारा। आज इसी रणभूमि में मैं उन सबकी मौत का बदला लूंगा। रावण तू किस मुंह से अपने आप को एक वीर कह रहा है। नीच नाश चर अबला स्त्रियों पर जोर आजमाने वाले कभी वीर नहीं होते तो सिर्फ एक कायर है। कायर सुनले। धर्म की मर्यादा तार तार करने वाले पापी तेरे पाप का दंड आज तुझे ज़रूर मिलेगा। क्या बोला, तू मुझे दण्ड देगा। अरे वनवासी दण्ड राजा देता है।

राजा तो कुछ ऐसा। वन वन भटकने वाला मामूली इंसान नहीं। जहां धर्म रथ पर बैठे प्रभु श्रीराम रावण का अहंकार तोड़ने में लगे थे, वहीं पाप रथ पर सवार रावण श्री राम को एक मामूली वनवासी समझकर उन पर ताबड़तोड़ तीरों की वर्षा कर रहा था। कुछ ही देर में श्रीराम के तीर ने रावण का रथ ही तोड़ दिया। इसके साथ ही उसके सारथी का भी प्रभु ने वध कर दिया। क्रोध में लाल श्रीराम ने अपने अगले तीर से सीधा निशाना रावण के शीर्ष पर लगाया और उसका सिर धड़ से अलग हो गया। लेकिन तभी धड़ पर नया से रुक गया। यह देखकर सभी हैरान थे।

इसके बाद श्रीराम ने फिर से रावण के शीर्ष पर निशाना साधा, लेकिन फिर से वही हुआ। शीश तो कट गया लेकिन धड़ पर फिर से नया स्वरूप गया। प्रभु राम की सेना यह देखकर बहुत विचलित हो गई। जाम्बवंत जी यह सब क्या हो रहा है? प्रभु के वार निष्फल क्यों जा रहे हैं? नहीं अंगद रघुवर के बार निष्फल नहीं हो रहे। यह तो रावण की माया है। जब जब उसका शीश कटेगा अपने आप उसके धड़ पर नया शीश आ जाएगा। तो फिर रघुवर रावण के हृदय पर।


निशाना क्यों नहीं लगा रहे? हृदय पर तीर लगते ही तो उसका वध निश्चित है। यह पूरा युद्ध स्वर्ग में बैठे देवता महादेव और ब्रह्मा जी भी देख रहे थे। जामवंत और अंगद के बीच हो रही इस वार्तालाप को सुनकर ब्रह्मा जी युद्धभूमि में प्रकट हो गए और अंगद को उसके सवाल का जवाब देने लगे। अंगद श्रीराम कभी भी रावण के हृदय पर बाण नहीं चलाएंगे क्योंकि उनको पता है कि रावण के हृदय में सीता का वास है और माता सीता के हृदय में श्रीराम का वास है।

वहीं प्रभु के उदर में पूरी सृष्टि वास करती है। ऐसी अवस्था में अगर वह तीर चलाएंगे तो रावण के साथ सीता और उनके साथ राम और राम के साथ पूरे संसार का। विनाश हो जाएगा। तो क्या रावण दांत कपि नहीं होगा प्रभु! होगा ज़रूर होगा। इतना कहकर बस ब्रह्माजी वहां से चले गए। उन्होंने यह तो नहीं बताया कि रावण का वध आखिर होगा कैसे? लेकिन इतना आश्वासन ज़रूर दे दिया कि वध तो ज़रूर होगा। मेरा वध करना तेरे बस की बात नहीं।

वनवासी अपनी इसे छोड़ दे और मेरे सामने अपना शीश चुका दें। तभी रावण का भाई विभीषण रामजी के पास जाकर उनको ब्रह्मा जी द्वारा रावण को दिए वरदान के बारे में बताता है। प्रभु ब्रह्मा जी के। से दशानन की नाभि में अमृत है जो एक विशेष अमृत बाण से ही सूख सकता है। तभी रावण की मृत्यु होगी।पलक झपकते ही हनुमान जी ने अपना रूप बदल लिया और वह साधु के भेष में आ गए। बम बम भोले, बम बम भोले, बम बम भोले भूत वर्तमान को देखो, मैं मुझसे कुछ भी छिपना पाय।

कल क्या होगा। जान लो कहीं देर न हो जाए। बम बम भोले। अपनी धुन में गुनगुनाते हुए हनुमान जी सीधा महल के अंदर चले गए। जहां जाते ही उन्हें हैरान परेशान अवस्था में रानी मंदोदरी मिलती हैं। प्रणाम महारानी, आप बहुत परेशान लग रही हैं। लगता है लंका और लंकेश की चिंता आपको खाए जा रही है। ऋषिवर!इसके बाद साधु रूपी हनुमान जी अपनी पोटली से एक पुस्तक निकालते हैं। नहीं, यह नहीं हो सकता।

आगे की कहानी whatsapp group पर जल्द ही अपलोड की जायेगी।

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