शनिदेव को सूर्यदेव का नाजायज संतान क्यों कहा जाता है ?

मिथुन यह तो हम सभी जानते हैं कि शनि देव सूर्य देव के पुत्र हैं। लेकिन क्या इस बात को जानते हैं आप कि शनि देव सूर्य देव के नाजायज संतान हैं, वास्तविक नहीं। तो आखिर ऐसी क्या वजह थी कि सूर्य देव ने अपने ही पुत्र को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और शनि देव को अपना नहीं पाए? इसके पीछे की क्या सच्चाई है? तो आइए जानते हैं पूरा सच।

मित्रों, भगवान शनि देव शनि ग्रह के स्वामी हैं। इनके सिर पर स्वर्ण मुकुट, गले में माला और शरीर पर नीले रंग के वस्त्र हैं और उनका शरीर भी नील मणि के समान दिखता है। ये गिद्ध या कोए की सवारी करते हैं। उनके हाथों में धनुष बाण और त्रिशूल हैं। शनिदेव का जन्म ज्येष्ठ माह की कृष्ण अमावस्या के दिन हुआ था। हालांकि कुछ ग्रंथों में शनिदेव का जन्म भाद्रपद माह की शनि अमावस्या को ही माना जाता है।

मित्रों, स्कंद पुराण के काशी खंड के अनुसार शनि भगवान के पिता का नाम सूर्य और माता का नाम छाया है। उनकी माता को समझना भी कहा जाता है, लेकिन इसके पीछे कहानी है। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान सूर्यदेव का विवाह दक्ष प्रजापति की बेटी संध्या देवी से हुआ था। सूर्यदेव और देवी संध्या से तीन संतान यानी के मनु, यम और यमुना का जन्म हुआ। परंतु देवी संध्या सूर्यदेव के तीव्र तेज को सहन करने में असमर्थ हो गई। संध्या सूर्यदेव के तेज से परेशान थी इसलिए वह सूर्यदेव की अग्नि को कम करने के बारे में सोचने लगती हैं।

दिन बीतते चले गए और फिर संध्या ने फैसला लिया कि वह तपस्या करेंगी और किसी तरह सूर्यदेव की चमक को कम कर देंगी। लेकिन अपने बच्चों की देखभाल करने के लिए और यह सुनिश्चित करने के लिए कि सूर्यदेव को इसके बारे में पता न चले। उन्होंने अपनी तरह की एक स्त्री का निर्माण किया और उसका नाम स्वर्ण रखा। एक तरह से यह संध्या की छाया के समान ही थी, इसलिए इसका नाम छाया भी है।

संध्या ने छाया से कहा कि अब से मेरे बच्चों और सूर्यदेव की जिम्मेदारी तुम्हारी होगी, लेकिन यह रहस्य केवल मेरे और तुम्हारे बीच ही रहना चाहिए। तो इस तरह से उन्होंने अपनी छाया को सूर्यदेव के पास भेज दिया। इसके बाद संध्या वहां से अपने पिता के घर पहुंची तो उसके पिता ने कहा कि तुमने यह अच्छा नहीं किया। तुम्हें अपने पति के पास वापस लौट जाना चाहिए। जब पिता ने उन्हें आश्रय नहीं दिया तो संध्या वन में चली गई और तपस्या में लीन हो गई।

उधर सूर्यदेव को इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि उनके साथ जो स्त्री रह रही है वह संध्या नहीं बल्कि उसकी छाया है। स्वर्णा अपने स्त्री धर्म का पालन करती रही और छाया रूप में होने के कारण उसे सूर्यदेव के तेज से कोई परेशानी भी नहीं हुई क्योंकि छाया देवी संध्या की छाया थी। अतः उसका रूप, गुण और आचरण आदि सब संध्या के समान ही था। अंततः सूर्य संध्या और छाया में अंतर ही नहीं समझ पाए।

सूर्यदेव के साथ रहने वाली स्वर्णा का छाया रूप होने के कारण सूर्यदेव के तप से उसे कोई परेशानी नहीं हुई और कुछ समय बाद स्वर्णा और सूर्यदेव के मिलने के कारण स्वर्णा गर्भवती हो गई। कुछ समय बाद छाया को पता चला कि वह गर्भवती हैं। तब देवी संध्या ने उसे जंगल में बुलाया और कहा कि अब तुम्हारा समय पूरा हो गया है। तुम यहां से चली जाओ। तुम केवल एक दासी मात्र हो। तुम मेरे प्रभु के करीब नहीं रह सकती हो। देवी संध्या की बातें सुनकर गर्भवती स्वर्णा जोर जोर से रोने लगती हैं और बोली, हे देवी! मैं आपकी छोटी बहन के ही तो समान हूं।

इस हालत में मैं कहां जाऊंगी? मेरे साथ ऐसी निर्दयता मत करो। इधर सूर्यदेव पेड़ के पीछे खड़े होकर यह सब देख और सुन रहे थे क्योंकि वे छाया का पीछा करते हुए वहां पर आ गए थे। देवी संध्या और छाया की बातें सुनकर वे उनके सामने आ जाते हैं और अपनी पत्नी से बोले कि हे देवी संध्या मेरी प्रियतमा, तुम तो यहां रह रही थी तो मेरे साथ कौन थी? यह स्त्री कौन है?

अपने पति की बात सुनकर देवी संध्या पूरी कहानी उन्हें बताती हैं। जिसके बाद सूर्यदेव भी छाया को स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं और वे उससे ग्रहण करती हैं। यह सब देख सुन छाया रोते हुए वहां से चली जाती हैं। गर्भावस्था के दौरान छाया देवों के देव महादेव की कठोर तपस्या में लीन हो जाती हैं। भोलेनाथ की भक्ति में लीन रहने के कारण अपनी सेहत का ठीक से खयाल नहीं रख पाती। कुछ वर्षों के बाद भगवान शिव छाया की भक्ति से प्रसन्न होते हैं और मां छाया को वरदान देते हैं।

अत्यधिक गर्मी और अपना ठीक से देखभाल नहीं करने के कारण गर्भ में पल रहे शनिदेव का रंग अधिक काला हो जाता है। फिर कुछ समय बाद जब शनिदेव का जन्म हुआ तो उनकी माता छाया उन्हें देखकर आश्चर्य चकित रह गई, क्योंकि सूर्यदेव के पुत्र होने के बावजूद शनिदेव का रंग अत्यंत काला था। जन्म के कुछ क्षण बाद ही शनि देव बालक रूप में आ जाते हैं। तब छाया माता ने पूछा बेटा, तुम इतनी जल्दी कैसे बड़े हो गए?

जिस पर शनिदेव कहते हैं, मैंने गर्भावस्था के दौरान आपकी पीड़ा सुनी थी और जिसकी मां पीड़ा में हो तो उसका बच्चा जल्द ही बड़ा होकर अपनी मां का दर्द दूर करता है। शनिदेव मित्र आगे कहते हैं कि चलो पिताजी के पास चलो, मैं तुम्हें तुम्हारा अधिकार दिलाऊंगा। फिर शनिदेव और माता छाया सूर्य लोक की ओर निकल गए जहां भगवान सूर्य का असर था। छाया माता को देखकर देवी संध्या और सूर्य देव आश्चर्य चकित हो गए और पूछा की यहां क्या करने आई है। जिस पर शनिदेव ने अपने पिता से कहा मैं आपका पुत्र हूं और अपनी मां को उसका अधिकार दिलाने आया हूं। शनिदेव की बातें सुनकर सूर्यदेव क्रोधित हो गए।

और बोले, तुम्हारे जैसा कुरूप बालक मेरा पुत्र नहीं हो सकता। शनिदेव का काला रंग देखकर सूर्यदेव को लगा कि यह तो मेरा पुत्र नहीं हो सकता। उन्होंने छाया पर संदेह करते हुए उन्हें अपमानित किया और कहा, न जाने तुम्हारी माता ने किसके साथ अवैध रिश्ता बनाया है, जिसका परिणाम तुम हो। सूर्यदेव की बातें सुनकर माता छाया रोने लगती हैं और कहती हैं हे भगवान!

कृपया मुझपर ऐसा लांछन न लगाएं। मैंने आपको सच्चे हृदय से प्यार किया है, आपकी सेवा की और उसका यह परिणाम है प्रभु। मेरा चरित्र इस तरह खराब न करें। अब मित्रो, यह सब दृश्य देखने के बाद शनिदेव ने अपना प्रकोप दिखाना शुरू कर दिया क्योंकि माता की तपस्या का बल शनिदेव में भी आ गया था।

जब उन्होंने क्रोधित होकर अपने पिता सूर्यदेव की ओर देखा तो उनकी शक्ति से सूर्यदेव काले पड़ गए और उन्हें कुष्ठ रोग हो गया। अपनी हालत देखकर सूर्यदेव भयभीत हो गए और भगवान शिव की शरण में चले गए। तब भगवान शिव ने सूर्यदेव को उनकी गलती का अहसास कराया। सूर्यदेव को अपने कृत्य पर पश्चाताप हुआ और क्षमा मांगी और फिर उन्हें अपना असली रूप प्राप्त हो जाता है। लेकिन इस घटना से बाप बेटे का रिश्ता हमेशा के लिए खराब हो जाता है

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