मासिक धर्म के बारे में फैलायी गयी अफवायें !

पिछले कई सालों से हमारे धर्म शास्त्र की आड़ में स्त्रियों को लेकर कई ऐसी अफवाहें फैलाई गई जिसके चलते आज हर औरत ये सवाल करती है कि क्या सच में मासिक धर्म के दौरान वो इतनी अपवित्र हो जाती है कि भगवान उन्हें अपने सामने देखना भी पसंद नहीं करते। क्यों पीरियड्स के दौरान उन्हें धार्मिक कार्यों से दूर कर दिया जाता है? क्या वो सच में इतनी अशुद्ध होती है कि प्रसाद तक ग्रहण नहीं कर सकती? क्या किसी में भेदभाव न करने वाली भगवान स्त्रियों को सच में इसी नजर से देखते हैं? ऐसे कई सारे सवाल हैं जो हर लड़की और स्त्री के मन में उठते हैं कि क्यों उन्हें मासिक धर्म के दौरान कंघी करने से, नाखून काटने से, यहां तक कि अचार छूने से भी मना कर दिया जाता है। इतना ही नहीं इस दौरान तो उन्हें ना नहाने तक की भी सलाह दी जाती है।

सोचने वाली बात है कि आखिर इन बातों में कितनी सच्चाई है और अगर ये सब कुछ सच है तो इनके पीछे की असली वजह क्या है? हमारे सनातन धर्म की बात करें तो इसमें महिलाओं के मासिक धर्म को कभी भी अभिशाप की नजर से नहीं देखा गया है। ज्यादा दूर ना जाकर अगर भारत के ही सदन पार्ट की बात करें तो वहां आज भी कई ऐसे गांव हैं जहां लड़की को जब पहली बार पीरियड्स आते हैं तो उसे बहुत धूमधाम के साथ सेलिब्रेट किया जाता है और इस सेलिब्रेशन में सिर्फ उसके घर की ही नहीं बल्कि परिवार और समाज के लोग भी हिस्सा लेते हैं। इतना ही नहीं यह उत्सव एक दो दिन नहीं बल्कि एक हफ्ते तक चलता है और कहीं कहीं तो ये 16 दिन तक भी मनाया जाता है अब जरा सोचिये अगर हमारे सनातन धर्म में मासिक धर्म को वाकई एक पाप की नज़र से देखा जाता तो इस तरह का उत्सव क्यों मनाते?

स्त्रियों का रजस्वला होना उनकी पवित्रता की निशानी है

चलिए इसी के साथ आपको एक प्रमाण और दे देते हैं जो इस बात को साबित करता है कि स्त्रियों का रजस्वला होना उनकी पवित्रता की निशानी है। आप लोगों ने कामाख्या देवी मंदिर का नाम तो जरूर सुना होगा। गुवाहाटी से लगभग आठ किलोमीटर दूर स्थित माता का ये मंदिर उनके सभी शक्तिपीठों का महा पीठ माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार हर साल जून के महीने में देवी यहां रजस्वला होती है और इस उत्सव को मनाने के लिए 5 से 10000 नहीं बल्कि 10 लाख से भी ज्यादा श्रद्धालु यहां इकट्ठा होते हैं। सोचिए जिस घर में पीरियड्स को इस तरह से पूजा जाता है, जहां देवी खुद रजस्वला होती हैं, वहां महिलाओं के मासिक धर्म को लेकर इस तरह की छोटी सोच कैसे हो सकती है। आपको बता दें स्त्री का मासिक धर्म उतना ही पवित्र और सम्माननीय है जितना पुरुषों का ब्रह्मचर्य होना।

अगर पुरुष ब्रह्मचर्य का सख्ती से पालन करते हुए जीवन देने वाले बीज को संभाल कर रखता है तो स्त्री का रजस्वला होना इस बात को दर्शाता है कि उसने भी ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए जीवन देने वाले बीज का त्याग किया है। सरल भाषा में कहें तो महिलाओं में मासिक धर्म और पुरुषों में ब्रह्मचर्य एक बराबर ही है। पर इसके अलावा भी बहुत सी ऐसी बातें हैं जो इस बात की गवाही देती हैं कि सनातन धर्म में स्त्रियों का रजस्वला होना बिल्कुल भी अशुद्ध नहीं है। दरअसल हिन्दू धर्म में इस तरह की एनर्जी को बहुत पॉजिटिव माना जाता है। लेकिन दूसरे धर्मों की बात करें या पश्चिम संस्कृति पर नजर डालें तो वहां इसे एक पाप की तरह देखा जाता है।

इसीलिए सनातन धर्म के साधु संतों और हमारे पूर्वजों की खुली सोच को झुठलाने, दबाने और बेकार साबित करने के लिए इन बातों को गलत ढंग से हमारे सामने रखा गया। कहते हैं जब आक्रमणकारियों ने भारत में आकर यहां कब्जा करना शुरू किया तो लड़कियों के पहले मासिक धर्म का उत्सव मनाना बंद करना पड़ा, क्योंकि उन दुष्टों की गंदी नजर हमेशा हमारी बहू बेटियों पर बनी रहती थी। इसलिए अपनी बेटियों को उन दरिंदों से बचाने के लिए इस तरह के सेलिब्रेशन को बंद कर दिया गया। क्योंकि कोई भी माता पिता ये नहीं चाहते थे कि उन आक्रमणकारियों को ये पता चले कि उनकी बेटी अब मैच्योर हो चुकी है। यानी कि आपको ये सब तो बताया जाएगा कि मंदिर नहीं जाना चाहिए, पूजा नहीं करनी चाहिए। लेकिन इसके पीछे की असली वजह क्या है इस बारे में बात नहीं की जाएगी। अब ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ये सब बातें आई कहां से। तो दोस्तों इन बातों को समझने के लिए आपको आयुर्वेद की सुश्रुत संहिता की रजस्वला परिचर्या को जानना होगा। आपको बता दें रजस्वला परिचर्या ऐसे कामों की लिस्ट है जिसमें यह बताया गया है कि पीरियड्स के दौरान महिलाओं को क्या नहीं करना चाहिए। जिसके अनुसार महिलाओं को मासिक धर्म के समय ज्यादा बोलने, ज्यादा हंसने और शोर शराबे में रहने से मना किया जाता है।

इस दौरान न नाखून काटना चाहिए, न बाल झाड़ने चाहिए

इतना ही नहीं इसमें यह भी बताया गया है कि इस दौरान उसकी को न तो काजल लगाना चाहिए, न नाखून काटना चाहिए, न बाल झाड़ने चाहिए, न दिन में सोना चाहिए, न ज्यादा तेल मसाले वाला भोजन करना चाहिए और न ही नहाना चाहिए। रजस्वला परिचर्या में ये सारी बातें तो लिखी हैं, लेकिन इसमें ये कहीं नहीं लिखा है कि मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को मंदिर नहीं जाना चाहिए। अब यहां आपको एक बात समझनी होगी हमारे सनातन धर्म में बिना स्नान किए। मंदिर नहीं जाता और रजस्वला होने के दौरान स्त्रियों को नहाने से मना किया गया है। यानी कि यह बात बहुत स्वाभाविक है कि बिना स्नान किए महिलाएं मंदिर कैसे जायेंगी और पूजा कैसे करेंगी। लेकिन इस बात को भी हमारे सामने गलत तरह से रखा गया जिसके चलते हम अपने ही पूर्वजों पर सवाल खड़े करने लगे। वैसे मंदिर न जाने के पीछे का एक कारण और है। अब यह तो आप सब जानते हैं कि हमारे मंदिरों में एक खास तरह की ऊर्जा होती है। अगर आपने गौर किया हो तो आप जब भी मंदिर से वापस आते हैं तो अपने अंदर एक खास तरह की ऊर्जा को महसूस करते होंगे। बता दें, यह ऊर्जा मंदिरों में तंत्र और आगम शास्त्र में दिए चक्र विद्या के अनुसार प्रतिष्ठित की जाती है। तो अगर कोई स्त्री मासिक धर्म के दौरान मंदिर जाती है तो हो सकता है उस ऊर्जा की वजह से उसका वात और पित्त बिगड़ जाए।

अब वात और पित्त क्या होता है यह हम आपको आगे बताएंगे। फिलहाल यह समझ लीजिए कि रजस्वला होने के दौरान अगर स्त्री का वात पित्त बिगड़ जाता है तो उसे बहुत दर्द झेलना पड़ता है। इसीलिए महिलाओं को पीरियड्स के समय मंदिर जाने से मना किया गया। आपको बता दें हमारे आयुर्वेद में जो बातें लिखी है वो यूं ही नहीं की गई है बल्कि उनके पीछे ठोस कारण है और वो कारण ऐसे है जिनसे विज्ञान भी अपना मुंह नहीं फेर सकता। तो चलिए आयुर्वेद के माध्यम से ही समझते हैं कि आखिर स्त्रियों को इस दौरान कई सारे कामों को करने से क्यों मना किया जाता है। आयुर्वेद की माने तो हमारे शरीर में तीन दोष होते हैं वात, पित्त और कफ जिसमें से वात हमारे शरीर के अंदर होने वाली गतियों को कंट्रोल करता है। फिर वो चाहे हमारे खून का संचार हो या फिर मलमूत्र की गति। पित्त का काम है हमारे शरीर के अंदर आने जाने वाली वायु को कंट्रोल करना। पित्त हमारे शरीर की ऊष्मा यानि की ऊर्जा को कंट्रोल करता है।

मासिक धर्म के दौरान वह सभी काम करने से मना किए जाते हैं जिनसे वात और पित्त पर असर पड़े

जैसे आपने सुना होगा खाने को पचाने के लिए शरीर को गर्मी की जरूरत पड़ती है तो इस तरह की सारी चीजे पित्त संतुलित रखता है। वहीं कफ हमारे शरीर के लिए पोषण और स्थिरता का काम करता है। इसके अलावा यह वात और पित्त को भी कंट्रोल रखता है। अब यहां आपको एक बात समझनी होगी कि वात, पित्त और कफ को आयुर्वेद में दोष कहा गया है। दरअसल इसके पीछे भी एक वजह है। कहते हैं अगर वात, पित्त और कफ शरीर में संतुलित नहीं रहते तो कई तरह की बीमारियां होने लगती हैं। यही वजह है कि इन्हें त्रिदोष भी कहा गया है। अब अगर आप इस बात को समझ गए होंगे तभी आप यह समझ पाएंगे कि रजस्वला परिचर्या में महिलाओं को जो काम करने से मना किया गया है, उनके पीछे का कारण क्या है। तो मासिक धर्म के दौरान स्त्रियों का वात और पित्त अपने आप बढ़ जाता है क्योंकि उस समय शरीर में एक नई तरह की क्रिया हो रही होती। अब जैसा कि हमने आपको बताया कि वात शरीर की गतियों को कंट्रोल करता है और पित्त ऊर्जा को और रजस्वला के दौरान स्त्रियों का ब्लड फ्लो भी होता है और इस क्रिया के चलते शरीर का तापमान भी बढ़ा होता है। यही वजह है कि महिलाओं का वात पित्त बढ़ जाता है।

इसीलिए मासिक धर्म के दौरान वह सभी काम करने से मना किए जाते हैं जिनसे वात और पित्त पर असर पड़े। अब इसे ऐसे समझिए जैसे पीरियड्स के समय स्त्रियों को नहाने से मना किया जाता है। क्यों? क्योंकि इस समय उसके शरीर का पित्त अपने आप बढ़ा होता है। यानी कि उसके शरीर का तापमान बढ़ जाता है। ऐसे में उस समय स्नान करना पित्त के विपरीत काम करना होगा। यह ठीक वैसे ही है जैसे खाने के बाद तुरंत नहाने से मना किया जाता है। इतना ही नहीं मासिक धर्म के दौरान मेहंदी लगाने से भी मना करते हैं। वो इसीलिए क्योंकि मेहंदी ठंडी होती है और शरीर का तापमान गर्म। जिस वजह से आपका पित्त बिगड़ सकता है। रजस्वला परिचर्या में मासिक धर्म के दौरान ज्यादा बोलने, ज्यादा हंसने और शोर शराबे में रहने से इसीलिए मना किया गया है क्योंकि इससे भी वात बिगड़ जाता है। ऐसे में महिलाओं को यह सलाह दी जाती है कि वह इस समय ध्यान करें या फिर किसी शांत जगह पर रहें और कम बोलें। अब अगर बात करें कंघी न करने या फिर नाखून न काटने की तो आपने गौर किया होगा कि पीरियड्स के समय आपके बाल काफी रूखे हो जाते हैं और अपने आप झड़ने लगते हैं। इस वजह से उस दौरान बाल झाड़ने से मना किया जाता है। पर अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों होता है?

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