माता सीता के जीवन की पूरी कहानी

आप सभी के प्रेम और आशीर्वाद से हमारे साथ देश विदेश के ढाई लाख से ज्यादा श्रोता जुड़ चुके हैं। इस उपलक्ष्य पर हम एक नई श्रृंखला पेश करने जा रहे हैं। यू श्रंखला समर्पित होगी। हिंदू पुराणों और ग्रंथों में वर्णित सुंदरता, तीज और बुद्धिमता की प्रतीक उन नारियों पर जिन्होंने हिंदू नारी समाज के लिए बहादुरी और समर्पण की प्रेरणा का स्त्रोत प्रदान किया। सभ्यताओं के विकास में हमेशा से ही पुरुषों का वर्चस्व रहा है और इतिहास में महिलाओं और लड़कियों को पसंद की चुनौतियां और अन्य उनका सामना करना पड़ा है जो आज के समय में भी उतना ही पर्याय है। फिर भी कुछ ऐसी वीरांगना है। इस भारतवर्ष की धरती पर जन्मी है जिन्होंने विपत्तियों पर विजय प्राप्त की। बाधाओं को तोड़ा और ऐसा करके इन प्रेरणात्मक महिलाओं ने दुनिया पर अपनी छाप छोड़ी है।

यह महिलाएं न केवल बुद्धिमान थी बल्कि चुंबकीय शारीरिक सुंदरता के संदर्भ में असाधारण और आकर्षक भी थी। इन सभी स्त्रियों ने हिंदू पौराणिक कथाओं में अपनी प्रबल उपस्थिति भी दर्ज कराई। स्क्रीन पर दिख रहे सब्सक्राइब बटन को दबाएं। अगर आप इस श्रंखला के आने वाले बाद भी देखना चाहते हैं। आज हम बात करेंगे तो इस युग में मिथिला की राजकुमारी और श्री राम की पत्नी सीता हिंदू पौराणिक कथाओं में अगर कोई आदर्श स्त्री बताई गई है तो निसंदेह देवी मां सीता है। वित्त आयोग में देवी मां लक्ष्मी का अवतार की मां सीता सीता ना तो भगवान द्वारा बनाई गई थी और ना ही किसी दैवीय पाठ्यक्रम से पैदा हुई थी। उनका अवतार हुआ था। भगवान विष्णु के राम अवतार में उनकी अर्धांगिनी बनकर उनका साथ देने के लिए भगवान राम की राक्षसों का विनाश करने की प्रतिज्ञा को मां सीता ने जीवन भर उज्जवल रखा और खुद बंदी बनकर राक्षसों के कुल के संग आरती लीला भी रची। धरती के गर्भ से मिथिला के राजा जनक को एक कन्या प्राप्त हुई और अपनी बेटी के रूप में पाल पोस कर उन्होंने उसे बड़ा किया। रामायण में कहा जाता है कि उसकी सुंदरता अद्वितीय थी और उसका कोई दूसरा सानी नहीं था।

सीता की एक छोटी बहन उर्मिला भी थी।अपने समर्पण आत्म, बलिदान, साहस और पवित्रता के लिए जानी जाती है। अपने नरम शब्दों और सकारात्मक आचरण के कारण सीता सभी की चहेती थी। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राजा जनक चाहते थे कि राजकुमारी सीता का विवाह भारतवर्ष के किसी महा प्रतापी राजकुमार के साथ हो और इसके लिए सभी बड़े राज्यों के राजकुमारों को सीता के स्वयंवर का न्योता भी भेजा गया। राजा जनक द्वारा की गई इस घोषणा का वर्णन वाल्मीकि रामायण में भी मौजूद है। राजा जनक द्वारा यह घोषणा की गई कि सीता के स्वयंवर में मौजूद जो भी पुरुष शिव के धनुष को उठाकर उस पर डोरा चढ़ाने में सफल रहेगा, वही उनकी पुत्री से विवाह करने लायक होगा। शर्त पूरी होने के बाद ही अयोध्या के युवराज रामचंद्र से उनका भव्य समारोह में विवाह हुआ। सीता की। छोटी बहन उर्मिला का विवाह रामचंद्र के छोटे भाई लक्ष्मण से हुआ। रानी बनने की जगह सीता को कुछ मिला तो 14 बरस का बनवास अपने पिता के दिए गए वचन को पूरा करने के लिए भगवान राम छोटे भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता सहित स्वेच्छा से 14 साल के बनवास पर चले गए।माता सीता की दैवीय सुंदरता को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि राक्षस राजा रावण ऐसा महा प्रतापी राजा था जिसने तीनों संस्थानों को जीत लिया, जिसमें सभी अप्सराओं और स्वर्गीय आनंद को प्राप्त किया, जिसकी सेविकाओं के रूप में तीनों दुनिया की सबसे खूबसूरत महिलाएं थी।

शुरू अपने का द्वारा दिया गया विवरण सुन बेवकूफ बन रावण सीता की तलाश में ठंडक के जंगलों में सीता की कुटिया तक जा पहुंचा। जब उसने भी पहली बार माता सीता को देखा तो कुछ देर के लिए मंत्रमुग्ध हो गया। जब रावण पहली बार उन्हें देखता है तो वे उनके बालों की तुलना वज्र के साथ करता है। रावण खुद से पूछता है कि क्या वे पृथ्वी पर दूसरे चांद को देख रहा है। इतना सुन महसूस करता है कि उसे भ्रम हो जाता है कि यह वास्तविकता है कि किसी तरह का छलावा आखिरकार में खुद को यकीन दिलाता है कि वह केवल वही स्त्री हो सकती है जिसके बारे में उसकी बहन सरूप नखा ने उसे बताया था। सीता के अलौकिक सौंदर्य से मोहित होकर ही रावण ने उसे बंदी बनाकर लंका ले जाने की योजना बनाई। रावण माता सीता को अपनी पटरानी बनाना चाहता था। बंधक बन कर भी भगवान!

राम के नाम पर जीने वाली सीता का दिल रावण कभी नहीं जीत सका। यदि रामायण में मंदोदरी की सुंदरता के विवरण का ज्यादा वर्णन नहीं मिलता तो इसके पीछे महाकाव्य में सीता की उपस्थिति है। परंतु यह केवल सीता की शारीरिक सुंदरता का वर्णन है। माता सीता की आंतरिक सुंदरता उसके शारीरिक रूप से कई गुना अधिक सुंदर थी। यह वही माता सीता थी जिनको राज धर्म के नाम पर लंका से वापस अयोध्या आने पर अपनी पवित्रता साबित करने के लिए अग्निपरीक्षा तक देनी पड़ी थी। उनकी सही सुनता नैतिकता मात्र, भावना, प्रकृति और हर प्राणी के लिए प्यार इन सभी पहलुओं की तुलना किसी और से नहीं की जा सकता। उनके जन्म से पहले ना जन्म के बाद मां सीता ने उन सभी लोगों को माफ भी किया जिन्होंने उनकी शुद्धता और चरित्र पर उंगलियां उठाई थी। वास्तव में पृथ्वी छोड़ने से पहले पृथ्वी की गर्भ में पुणे सम आने से पहले माता सीता ने भगवान राम से उन सभी लोगों को शमा करने के लिए अनुरोध किया जिन्होंने उनके चरित्र पर सवाल उठाए और दोषी ठहराया। जय श्री राम के साथ 14 साल के वनवास में थी सभी प्राणी।

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