भगवान शिव ने क्यों की वीरभद्र की उत्पत्ति

शिव बेहद बोले हैं बिना अपने भक्तों में भेद किए उनकी भक्ति से बहुत ही जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। उनकी इसी खूबी की वजह से शुरू भोलेनाथ की कहा जाता है। यहां एक और महादेव को प्रसन्न करना इतना आसान है। वही उनके क्रोध से खुद को बचा पाना भी बेहद मुश्किल है। शायद यही वजह है कि उनके भक्तों ने विराट के देवता भी कहते हैं। जितने पर मधुर मुस्कान रखने वाले भगवान शिव के कई दुष्टों का संहार किया है। शिव के गण वीरभद्र का एक ऐसा ही रहते हैं। इसकी उत्पत्ति शिव की क्रोध के आवेग में हुई थी। आज हम आपको वीरभद्र की कहानी सुनाने जा रहे हैं। आप सभी का स्वागत है।

वीरभद्र अवतार का संबंध, शिव और सती के विवाह और सती के पिता प्रजापति दक्ष द्वारा संपन्न यज्ञ से दक्ष ब्रह्मा के पुत्र थे और उन्हें प्रजापति अर्थात मानव जाति के राजा भी कहा जाता था। दक्ष की पुत्री सती अपने बाल्यकाल से ही भगवा। शिव की भक्ति हमेशा उनकी अराधना में ही अपना समय व्यतीत करती बचपन में ही सती ने यह निश्चय कर लिया था कि मैं बड़े होकर शिव को ही अपना पति स्वीकार करेगी। लेकिन प्रजापति दक्ष को यह कभी भी स्वीकार नहीं था क्योंकि वह अपने राज्य का विस्तार करने और खुद को शक्तिशाली प्रमाणित करने के लिए अपनी पुत्री का विवाह एक उच्च कराने में करना चाहते थे। परंतु शिव तो धन-संपत्ति की माया से पूरी तरह से दूर रहकर कैलाश पर्वत पर रहते थे।

महादेव तो एक साधारण जीवन जीते जो दक्षिण को बिल्कुल पसंद नहीं था। वे नहीं चाहते थे कि महादेव से विवाह कर उनकी पुत्री भी एक बनवासी की तरह जीवन यापन कर पिता की तरह वह भी अपनी पुत्री को आरामदायक जीवन देना चाहते थे। जब सती विवाह योग्य हुई तब उनके पिता प्रजापति दक्ष ने स्वयंवर का आयोजन किया ताकि सती अपनी पसंद से अपने लिए वर का चुनाव करें। इस स्वयंवर में राजा दक्ष ने सभी देवता गणों को आमंत्रित किया, लेकिन भगवान शिव को निमंत्रण नहीं भेजा गया। जब सती स्वयंवर में उपस्थित हुई तब अपने आराध्य शिव को वहां ना पाकर काफी।उन्होंने अपनी वरमाला को हवा में उछाल दिया और शिव से उसे ग्रहण करने की प्रार्थना की थी।

उस समय वहां उपस्थित नहीं थे, लेकिन वह मालासी भी जाकर शिव के गले में पड़ी। अपनी पुत्री की यह हरकत देख दक्ष अत्यधिक क्रोधित हुए। लेकिन मजबूरन शिव और सती के विवाह को स्वीकार करना ही पड़ा। फिर भी उन्होंने कभी अपने ह्रदय से भगवान शिव को नहीं अपनाया। कुछ समय पश्चात ब्रह्मा जी द्वारा यज्ञ का आयोजन किया गया जिसमें सभी देवताओं, प्रजापति और राजाओं को आमंत्रित किया गया। इस यज्ञ में शिव सती और दक्ष को भी आमंत्रण भेजा गया। यज्ञ प्रारंभ होने वाला था। सभी लोग मौजूद थे। प्रजापति दक्ष सबसे आखिर में आए उनके आते ही ब्रह्मा जी सती और भगवान शिव को छोड़कर अन्य सभी देवताओं और राजाओं ने खड़े होकर उनका स्वागत किया।

जब महादेव दक्ष के स्वागत में खड़े नहीं हुए तो प्रजापति दक्ष को लगा कि महादेव और सती ने उनका अपमान किया है। उसी समय दक्ष ने यह निश्चय कर लिया कि वह अपने इस अपमान का बदला लेकर रहेंगे। इस घटना के कुछ समय पश्चात।प्रजापति दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया और उस यज्ञ में अपनी पुत्री और शिव के अलावा सभी को आमंत्रित किया। जब सभी को इस यज्ञ की जानकारी मिली तब सती ने अपने पति भगवान शिव से कहा कि उन्हें भी उसमें शामिल होना चाहिए कि बात तो यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि बिना निमंत्रण के किसी भी स्थान पर जाना उचित नहीं है।

सभी ने शिव के सामने कई बार व्यक्ति कि वह अपने पिता की सबसे चहेती पुत्री है। उन्हें किसी निमंत्रण की आवश्यकता नहीं। भगवान शिव तो यज्ञ में शामिल होने के लिए राजी नहीं हुए लेकिन सती के बार-बार आग्रह करने की वजह से उन्होंने नंदी के साथ सती को वहां भेज दिया। जब प्रजापति दक्ष ने अपनी पुत्री को देखा तो उन्होंने सती और उनके पति महादेव का अनादर करना शुरू कर दिया। सती से अपने पति का अनादर सहन नहीं हुआ और उन्होंने यज्ञ की अग्नि में कूदकर अपनी जान दे दी।

इस घटना की जानकारी भगवान शिव को लगी तो वह क्रोध पर नियंत्रण नहीं रख पाए। भगवान शिव ने उग्र रूप धारण कर विरोध में अपने होंठ चबाते हुए अपनी एक जटा उखाड़ ले जो बिजली और आग की लपट के समांतर। की हो रही थी। उनके क्रोध से पूरी सृष्टि कांपने लगी। अपने इसी क्रोध की ज्वाला से उन्होंने वीरभद्र की उत्पत्ति की और उसे ही आदेश दिया कि वह प्रजापति दक्ष और उसकी सेना का विनाश कर दे। खड़े होकर उन्होंने गंभीर 28 के साथ जटा को पृथ्वी पर पटक दिया।

महादेव की आज्ञा पाकर वीरभद्र क्रोध से कांप उठा। वीरभद्र ने बिना समय नष्ट किए महादेव के आदेश का पालन करना शुरू कर दिया। कनखल क्षेत्र जाकर यज्ञ का विध्वंस करने लगे। यज्ञ मंडप में भगदड़ मच गई। देवता और ऋषि मुनि भाग खड़े हुए हालांकि दक्ष को परास्त करना बहुत कठिन काम था। लेकिन वीरभद्र ने इस काम को भी कर दिखाओ। महादेव की वीरभद्र अवतार ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया। इसके अलावा जो भी उसके मार्ग में आया, उसने उसका सर्वनाश कर दिया। देखते ही देखते उन्होंने दक्ष का मस्तक काट कर फेंक दिया। उसे मृत्युदंड दिया। इसके अलावा भी जो उसके मार्ग में आया। उसने उसका सर्वनाश किया। ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने सोचा कि यज्ञ को बीच में छोड़ देना शुभ नहीं है लेकिन जिसने इस यज्ञ का आयोजन की

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