तुलसी और शालिग्राम विवाह की पौराणिक कथा,जिसे 99% हिन्दू नहीं जानते

मित्रो वैसे तो आपने कई देवी देवताओं के विवाह की कथा सुनी होगी लेकिन क्या आपने देवी तुलसी और भगवान शालिग्राम के विवाह की कथा सुनी है और क्या आपको पता है कि माता तुलसी और शालिग्राम जी का विवाह क्यों हुआ? अगर नहीं तो चलिए मिलकर जानते हैं आज। और मित्रों ऐसी सभी एक्सक्लूजिव वीडियो देखने के लिए हमारे चैनल द डिवाइन टेल्स के मेंबर जरूर बनें। अब मित्रो जैसा कि सभी जानते हैं कि हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को तुलसी पूजा का शुभ मुहूर्त का समय निर्धारित किया गया है। इस दिन का महत्व इसलिए भी ज्यादा खास है क्योंकि इससे एक दिन पहले ही भगवान श्रीहरि नारायण विष्णु चार महीने की अपनी लंबी नींद से जागते हैं और फिर भक्तों की विनती सुनते हैं। इसी के साथ इस दिन से विवाह, गृहप्रवेश, उपनयन संस्कार सभी के शुभ मुहूर्त पुनः आरंभ हो जाते हैं।

मित्रो बता दें कि इसी खास अवसर पर शालीग्राम जी का देवी तुलसी से विवाह करने की परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि तुलसी विवाह के दिन सुहागिन स्त्रियां देवी तुलसी की पूजा करके सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। इस दिन पूरे विधि विधान से देवी तुलसी और भगवान शालिग्राम जी का विवाह किया जाता है। बता दें कि शालिग्राम भगवान विष्णु के ही एक प्रतिरूप हैं। नारद पुराण के अनुसार एक समय असुरराज जालंधर के अत्याचारों से ऋषि, मुनि, देवता और नारी सभी बहुत परेशान थे। वह बहुत ही पराक्रमी, वीर और क्रूर था और उसकी ताकत के पीछे उसकी पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली पत्नी वृंदा के पुण्यों का फल था। जिसके कारण वह कभी हारता नहीं था। उससे परेशान होकर सभी देवतागण भगवान श्रीहरि विष्णु के धाम बैकुंठ गए और प्रभु से उस दुष्ट को हराने का उपाय पूछने लगे।

फिर भगवान विष्णु ने वृंदा का पति व्रत धर्म तोड़ने का उपाय सोचा। श्रीहरि विष्णु ने जालंधर का रूप धारण किया और वृंदा को स्पर्श कर दिया जिस कारण वृंदा का पतिव्रत धर्म भंग हो गया और फिर एक भीषण युद्ध में जालंधर मारा गया। अब चूंकि भगवान विष्णु ने छल कर वृंदा को स्पर्श किया था तो अपने पति के वियोग से दुखी होकर उसने श्रीहरि नारायण को ही श्राप दे दिया कि आपकी पत्नी का भी छल से हरण होगा और आपको भी पत्नी वियोग सहना होगा। यह श्राप देने के बाद वह अपने पति जालंधर के साथ चिता की अग्नि में बैठ गई, जिसकी राख से ही तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ। दूसरी तरफ वृंदा का पतिव्रत धर्म तोड़ने के चलते भगवान विष्णु को भी बहुत ग्लानि हुई। तब उन्होंने वृंदा को आशीष दिया कि वह तुलसी स्वरूप में हमेशा उनके साथ रहेंगी।

साथ ही उन्होंने कहा कि कार्तिक शुक्ल एकादशी को जो भी शालीग्राम स्वरूप में उनका विवाह तुलसी से करायेगा उसकी हर इच्छा, हर मनोकामना पूरी होगी। और मित्रो तब से ही देवी तुलसी के विवाह की यह परंपरा चली आई है। वहीं एक दूसरी कथा के अनुसार एक परिवार में ननद भाभी रहा करती थी। नंदा भी कुंवारी थी और वह देवी तुलसी की बड़ी ही सेवा सत्कार किया करती। लेकिन वहीं भाभी को यह जरा भी रास नहीं आता था। कभी कभी तो वह क्रोध में यह भी कहती कि तेरा विवाह होगा तो तुझे तुलसी ही दहेज में दूंगी। समय बीतता गया और जब ननद की शादी हुई तो उसकी भाभी ने क्या किया कि बारातियों के सामने तुलसी का गमला फोड़कर रख दिया। लेकिन मित्रों, भगवान विष्णु की कृपा से वह गमला स्वादिष्ट व्यंजनों में परिवर्तित हो गया। और तो और जब गहनों के बदले में भाभी ने ननद को तुलसी की माला पहनाई तो वह भी सोने के आकर्षक आभूषणों में बदल गई। वही वस्त्रों के स्थान पर जब तुलसी का जनेऊ रखा गया तो वह रेशमी कपड़ों में बदल गया। यह सब देख भाभी बड़े ही आश्चर्य में पड़ गई। जिसके बाद तुलसी जी की पूजा का महत्व उसकी समझ में भी आ गया।

फिर उसने देवी तुलसी और भगवान विष्णु से माफी मांगी और फिर उनकी विधिपूर्वक पूजा अर्चना की। इसी के साथ मित्रों अब आपको यह भी बताते चलते हैं कि किन स्त्रियों को देवी तुलसी की पूजा नहीं करनी चाहिए। अब यह सोचने वाली बात है क्योंकि देवी तुलसी की पूजा का महत्व सुहागिन स्त्रियों के लिए बहुत है और अगर विवाहित महिलाएं नियमित तुलसी पूजा करती हैं तो उन्हें बहुत पुण्य मिलता है। लेकिन मित्रों अगर आपने हिन्दू धर्म के मुताबिक विवाह नहीं किया है, अग्नि के सात फेरे नहीं लिए हैं तो आपका विवाहित होकर भी तुलसी के पास जाना वर्जित है। अब अगर आपने कोर्ट मैरिज की है तब भी आपको तुलसी पूजा नहीं करनी चाहिए।

लेकिन वहीं अगर आप अभी तक कुंवारी हैं तो आपको तुलसी पूजा की अनुमति मिलती है। इसके अलावा अगर आप धर्मशास्त्रों के इन नियमों को ताक पर रखकर जबरदस्ती तुलसी पूजा करती हैं तो इसका असर आपके जीवन पर अच्छा नहीं पड़ता। देवी लक्ष्मी आपसे नाराज हो जाती हैं और कभी भी आपके घर नहीं आती, जो आपके जीवन के लिए बिल्कुल भी सही नहीं। वहीं ऐसा भी कहा जाता है कि एक वेश्या और गंदे खयाल रखने वाली महिलाओं को भी भूलकर भी तुलसी पूजन नहीं करना चाहिए। ऐसा करने वाली वैश्या को अगले जन्म तक इस गलती की भरपाई करनी पड़ती है। इसे भगवान का अनादर माना जाता है और देवी तुलसी ऐसे लोगों से हमेशा रुष्ट रहती है। वह उनकी पूजा कभी स्वीकार नहीं करती। वहीं मासिक धर्म के समय भी महिलाओं को तुलसी पूजा नहीं करनी चाहिए। शिवपुराण में तो यहां तक बताया गया है कि इन्हें तो भगवान श्रीहरि की मूर्ति का स्पर्श भी नहीं करना चाहिए। इस समय किसी प्रकार की दान दक्षिणा देना भी सही नहीं माना जाता।

दरअसल इस समय शरीर की शुद्धि की प्रक्रिया चल रही होती है, जिसके चलते। शास्त्रों में नारी को इस समय सभी सांसारिक कामों और देव पितृ कार्यों से स्वतंत्र किया गया है। इस समय मानसिक जप करना मन और शरीर दोनों के लिए अच्छा माना गया है। वहीं मित्रों ऐसा कहा जाता है कि जिस घर के आंगन में तुलसी का पौधा होता है वहां किसी तरह का कोई वास्तु दोष नहीं होता। लेकिन माता तुलसी के पौधे को घर में रखने के बहुत से नियम होते हैं और अगर आप उन्हें नियमों के अनुसार देवी तुलसी की पूजा नहीं करते तो आपको भगवान का आशीर्वाद प्राप्त नहीं होता। तो मित्रों आज हमने जाना कि क्यों होता है देवी तुलसी और शालिग्राम का विवाह। साथ ही जानें तुलसी के पौधे को रखने के कुछ खास नियम। तो अगर यहां दी गई जानकारी आपको अच्छी लगी हो तो इसे अपने मित्रों, रिश्तेदारों के साथ भी जरूर साझा करें और इस तरह की सभी धार्मिक और आध्यात्मिक जानकारियों के लिए जुड़े रहें द डिवाइन टेल परिवार के साथ। तो मित्रो फिलहाल आज के लिए बस इतना ही। अब इजाजत दें। आपका बहुत बहुत शुक्रिया।

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