गुरु नानक की 4 चमत्कारिक कहानियां

गुरु नानक की 4 चमत्कारिक कहानियांरैंक वाइज वीके विशु गवाया खाए विजय साजन कौड़ी बदला जाए अर्थात मनुष्य सांसारिक मोह माया में फंसा रहता है। ईश्वर को सर्वव्यापी है और यह मनुष्य जीवन उसी परमात्मा की अनमोल देन है। इसे व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। गुरु नानक देव एक महापुरुष व महान धर्म प्रवर्तक थे जिन्होंने विश्व से सांसारिक अज्ञानता को दूर कर आध्यात्मिक शक्ति को आत्मसात करने हेतु पूरी मानव जाति को प्रेरित किया। उनका जोर इस बात पर रहा कि एक छोटी सी चीज भी जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है।

वह किसी भी शास्त्र को नहीं जानते थे। उनके अनुसार जीवन ही सबसे बड़ा शास्त्र है। शास्त्रों तो पुराने पड़ जाते हैं लेकिन जीवन के अनुभव कभी पुराने नहीं पड़ते। नानक के बचपन में ही अनेक अद्भुत घटनाएं घटित हुई। दिल से लोगों ने समझ लिया कि नानक एक असाधारण बालक है। गुरु नानक जी बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। सवार थे। वे चिंतनशील और एकांत प्रिय थी वाला अवस्था में गुरु नानक का मन स्कूली शिक्षा की अपेक्षा साधु संतों एवं विद्वानों की संगति में अधिक रमता था।

पुत्र को गृहस्थ जीवन में लगाने के उद्देश्य से पिता ने जब उन्हें व्यापार हेतु कुछ रुपए दिए तब उन्होंने सारा धन साधु संतों एवं महात्माओं की सेवा सत्कार में खर्च कर दिया। उनकी दृष्टि में साधु संतों की सेवा ही सच्चा सौदा है और इससे ज्यादा लाभकारी सौदा और कुछ नहीं हो सकता। एक और चमत्कारी घटना है। नानक गर्मियों की चिलचिलाती धूप में किसी गांव में गर्मी से बेहाल विश्राम करने के लिए जमीन पर ही लेट गए। उन्हें कब नींद आ गई। पता ही नहीं चला कि एक बड़े से नाग ने अपना फन फैलाकर उन्हें छाया प्रदान कर दी थी। गांव वाले यह दृश्य देखकर अचंभित हो गए। गांव के मुखिया ने उन्हें देश ग्रुप समझकर प्रणाम किया।

तभी से नानक के नाम के आगे देव शब्द जुड़ गया। वह कालांतर में गुरु नानक देव के नाम से भिक्षा।गुरु नानक देव जी को ज्ञान की प्राप्ति हुई तब एक दिन भ्रमण के दौरान सैदपुर पहुंचे। सारे शहर में यह बात फैल गई। एक परम दिव्य महापुरुष पधारे हैं। शहर का सबसे अमीर आदमी था। मालिक बाबू और बेईमानी से धन कमाता था। वह गरीब किसानों से बहुत ज्यादा लगान वसूल था और कई बार उनकी फसल भी हड़प लेता था। जब मालिक बाघों को नानक देव जी के आने का पता चला तो उसने गुरु नानक को अपने घर बुलाने का मन बनाया। बाबा नानक अपने एक दिन वक्त भाई लालू के घर रुके हुए थे।

लालू बहुत खुश था और वह बड़े आदर सत्कार से गुरु जी की सेवा कर रहा था। गुरु नानक भी बड़े। प्रेम से उसकी रूखी सूखी रोटी खाते थे। जब मालिक बागों ने गुरु जी को अपने महल पर आने का न्योता दिया। तब गुरु जी ने उसका निमंत्रण ठुकरा दिया। यह सुनकर भागों को बहुत गुस्सा आया और उसने गुरु जी को अपने यहां लाने का हुक्म दिया। मालिक के आदमी नानक देव जी को उसके महल में लेकर आए तो मालिक बोला गुरूजी।मैंने आपके ठहरने का बहुत बढ़िया इंतजाम किया था। कई सारे स्वादिष्ट व्यंजन भी बनवाए थे। फिर भी आप उस गरीब भाई लालू की सूखी रोटी खा रहे हो। ऐसा क्यों गुरु जी ने उत्तर दिया।

मैं तुम्हारा भोजन नहीं खा सकता क्योंकि तुमने गलत तरीके से गरीबों का खून चूस कर यह रोटी कमाई है, जबकि लालू की सूखी रोटी उसकी इमानदारी और मेहनत की कमाई है। मलिक वालों ने गुरुजी से इसका सबूत देने को कहा। गुरु जी ने लालू के घर से रोटी का एक टुकड़ा मंगवा या फिर शहर के लोगों के भारी जमावड़े के सामने गुरुजी ने एक हाथ में भाई लालू की।

सूखी रोटी और दूसरे हाथ में मालिक बाघों की चुपड़ी रोटी उठाई। दोनों रोटियों को जोर से हाथों में दबाया तो लालू की रोटी से दूध और मालिक बाघों की रोटी से खून टपकने लगा। भरी सभा में मलिक बागो अपने दोष कर्मों का सबूत दे। बुरी तरह से और नानक देव जी के चरणों में गिर गया। एक अन्य रोचक घटना में उनके पिता ने उन्हें ग्रह की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए तत्कालीन नवाब लोधी खा के यहां नौकरी दिलवा दी। वहां उन्हें भंडार नहीं।

शिव की नौकरी प्राप्त हुई परंतु नानक वहां भी साधु-संतों पर बेहिसाब खर्च करते रहे। इसकी शिकायत नवाब तक पहुंची। तब उसने नानक के खिलाफ जांच के आदेश दे दिए। परंतु आश्चर्य की बात यह थी। जांच में कोई कमी नहीं पाई गई। एक बार नानक देव भ्रमण के दौरान मक्का पहुंचे। थकान के कारण का बाकी और पैर करके सो गए। जब वहां के मुसलमानों ने यह दृश्य देखा तो वे अत्यधिक क्रोधित हुए चमत्कार तो उस समय घटित हुआ। जब लोग उनका पैर जिस दिशा में करते उसी दिशा में काबा के दर्शन होते यह देख सभी ने उनसे श्रद्धा पूर्वक क्षमा मांगी। श्री गुरु नानक देव जी का जीवन भर साथ उनके शिष्य मर्दाना नहीं दिया। क्यों धर्म से मुसलमान थे?

आप देखिए नानक देव जी के तप का प्रभाव इतना था कि मरदाना ने अपना पूरा जीवन गुरु नानक जी की सेवा में ही गुजारा। इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि मरदाना ने कभी अपना धर्म छोड़ने या पकड़ने का नाटक किया हो तो सैकड़ों साल पुराने सामाजिक सर आज के सचिव यह जरूरी नहीं है।

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