क्या होता है शिवरात्रि के दिन काठगढ़ महादेव मंदिर में?

धार्मिक दृष्टि से पूरा संसार ही शिव का रूप है। भगवान शिव को संघार के देवता कहा जाता है। शृष्टि की उत्पत्ति स्थिति एवं संघार के अधिपति शिव ही तो हैं। इसीलिए शिव के अलग-अलग अद्भुत स्वरूपों में मंदिर और देवालय हर जगह पाए जाते हैं। आज चलेंगे। ऐसे ही एक शिव मंदिर में आपका स्वागत है। काठगढ़ महादेव इस मंदिर का शिवलिंग प्रसिद्ध है क्योंकि इसमें भगवान शंकर के अर्धनारीश्वर स्वरूप के साक्षात दर्शन होते हैं।

काठगढ़ महादेव संसार में एकमात्र शिवलिंग माना जाता है जो आधा शंकर और आधा पार्वती का रूप लिए हुए हैं। यानी एक शिवलिंग में दो बाग है। शिव रूप का बाग लगभग 6 फुट और पार्वती रूप का शिवलिंग का रिश्ता थोड़ा छोटा होकर करीब 5 फुट का है। यह लिंगम हरे भूरे रंग के बलुआ पत्थर से बने हुए हैं। दो भागों में विभाजित इस आधी शिवलिंग का अंतर ग्रहों एवं नक्षत्रों के अनुसार घटता बढ़ता रहता है और शिवरात्रि पर दोनों का मिलन हो। जाता है काठगढ़ महादेव मंदिर का यह विचित्र शिवलिंग शिवरात्रि के दिन दोनों भाग मिलकर एक हो जाते हैं और शिवरात्रि के बाद इनमें वापस धीरे-धीरे अंतर बढ़ने लगता है।

शिवरात्रि का दिन इनका मिलन माना जाता है। इस दिन भगवान शिव की शादी माता पार्वती के साथ हुई थी। काठगढ़ में सावन माह और महाशिवरात्रि के दिन विशेष शिव पूजा और धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। इसलिए इस समय काटकर की यात्रा सबसे अच्छी मानी जाती है। सिद्ध मंदिर होने के कारण यहां भक्तजन सावन के महीने में भी आराधना करने आते हैं। शिव और शक्ति के अर्धनारीश्वर स्वरूप के संगम के दर्शन करने के लिए यहां कई भक्त आते हैं। काठगढ़ महादेव मंदिर के दक्षिण में व्यास नदी है। यह धर्मस्थल दो नदियों का मिलन स्थान भी है। शिवपुराण की कथा के अनुसार जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच बड़े और श्रेष्ठ होने की बात पर विवाद हुआ तब बहुत तेज प्रकाश के साथ 1 ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ।

अचंभित विष्णु और ब्रह्मा देव उस ज्योतिर्लिंग का आरंभ और अंत नहीं खोज पाए किंतु ब्रह्मदेव ने अहंकार के कारण यह झूठा दावा किया।उनको अंत एवं आरंभ पता है तब शिव ने प्रकट होकर ब्रह्मदेव की निंदा की और दोनों देशों को समान बताया। माना जाता है कि वही ज्योतिर्मय शिवलिंग काठगढ़ का शिवलिंग है क्योंकि शिव का वह दिव्य लिंग शिवरात्रि को प्रकट हुआ था। इसलिए लोक मान्यता है कि काठगढ़ महादेव शिवलिंग के दो भाग भी चंद्रमा के चरणों के साथ करीब और दूर आते हैं। काठगढ़ शिवलिंग दर्शन के लिए पहुंचने का मुख्य मार्ग पंजाब का पठानकोट और हिमाचल प्रदेश के इंदौर तहसील से है। यहां से काठगढ़ की दूरी लगभग 6 से 7 किलोमीटर की है।

बताया जाता है कि इस मंदिर में महाराजा रणजीत सिंह के कार्यकाल में सबसे ज्यादा प्रसिद्धि प्राप्त की थी। कहते हैं महाराजा रणजीत सिंह ने जब गद्दी संभाली तो पूरे राज्य के धार्मिक स्थलों का भ्रमण किया। वह जब काठगढ़ पहुंचे तो इतना आनंदित हुए कि उन्होंने आदि शिवलिंग पर सुंदर मंदिर का निर्माण करवाया और शिवलिंग की इस महिमा का गुणगान विचारों और करवाया।मंदिर के पास ही बने एक कुएं काजल उन्हें इतना पसंद था कि वह हर शुभ कार्य के लिए यही सेजल मंगवाते थे।

मान्यता के अनुसार यह कुआं राजा दशरथ जब अपनी बारात लेकर कश्मीर जा रहे थे तब बनवाया गया। यहां तक कि सिकंदर ने पोरस के साथ एक उग्र युद्ध के बाद इस मंदिर का दौरा किया और मंदिर और शिवलिंग ओं की शान तथा और देवत्व से प्रभावित होकर मंदिर परिसर में निर्माण भी करवाया। मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व में जो वास्तुकला की रोमन शैली में निर्मित है। व्यास नदी पर स्थित काठगढ़ मिरथल पहुंचने पर सिकंदर की सेना ने मगध की सेना की सैन्य शक्ति की खतरनाक रिपोर्टों के कारण आगे जाने से इंकार कर दिया। सितंबर 326 ईसा पूर्व में गहरे तिरस्कार में सिकंदर को अपनी सेना पीछे हटाने की घोषणा करनी पड़ी उम्मीद करते हैं। दोस्तों काठगढ़ महादेव की यह कहानी आपको बेहद पसंद आई होगी। अगर आपके पास कोई सुझाव है या शिकायत है तो हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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