क्या है रहस्य भगवन शिव के त्रिशूल का

नमस्कार दोस्तों दलित में आपका अभिनंदन है। परम शक्तिशाली परम ज्ञानी तथा संसार के संघार करता देवाधिदेव महादेव शिव की उपासना प्राचीन काल से होती आ रही है। चेहरे पर क्रोध एवं तेज जटाओं में गंगा तथा हाथ में त्रिशूल महादेव शिव की दैवीय शक्ति का वर्णन करते हैं। शिवजी का त्रिशूल एक अत्यंत महत्वपूर्ण सच कहा जाता है।

इसे पवित्रता एवं शुभ कर्म के प्रतीक के रूप में भी जाना जाता है तो आइए आज की कड़ी में जानते हैं। शिव त्रिशूल का महत्व शिव का अर्थ है। कल्याण स्वरूप शांत मुद्रा में खड़े महादेव शिव के हाथों में त्रिशूल कोई संघार करने वाला शस्त्र नहीं अपितु आध्यात्मिक जीवन के तीन मूल आयाम, इडा पिंगला तथा सुषुम्ना नाड़ी का प्रतीक है। मानव शरीर में प्राणों को ऊर्जा प्रदान करने वाले में तो यह तीन गाड़ियां ही हैं। इन्हीं के द्वारा पूर्ण मानव शरीर में प्राण भाइयों का संचार होता है।

साधारण से देखा जाए तो इस मनुष्य के बनड़ा और पिंगला द्वारा प्रदान की गई ऊर्जा पर ही निर्भर होकर जीवन व्यतीत करता है और भौतिक जीवन का ही आनंद लेना चाहता है। इसी कारण आध्यात्मिक दृष्टि से मनुष्य दुर्बल होता है। मन अशांत और असंतुष्ट रहता है और अध्यात्म का आनंद ही नहीं ले पाता जो कि मनुष्य का धर्म है।

खिलाड़ी का आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत अधिक महत्व है। सुषुम्ना अर्थात सरस्वती नाड़ी हमारे शरीर का एक महत्वपूर्ण भाग है। जब ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी से प्रवाहित होती है तो मन पूर्णतया शांत संतुलित व संतुष्ट रहता है और भौतिक जगत की कोई भी परिस्थिति मनुष्य जीवन में बिजली नहीं डाल सकती या यूं कहें कि आपकी मन की शांति।नहीं हो सकती महादेव, सीखो आदि योगी जी ने कहा जाता है क्योंकि शिव जी ने सैनिक ऊर्जा को सुषुम्ना नाड़ी से प्रवाहित करके सहस्रार चक्र में स्थापित किया, जिसे उन्होंने अपनी कुंडलिनी जागृत कर ली थी तो मित्रों यह था शिवजी के त्रिशूल का महत्व

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