क्या बर्बरीक से डरते थे श्री कृष्ण

श्रीकृष्ण क्यों डरते थे बर्बरीक से? महाभारत का युद्ध शुरू होने वाला था। देशभर के योद्धा या तो कौरवों के साथ या पांडवों के साथ। इसी बीच महाबली भीम के पौत्र बर्बरीक भी कुरुक्षेत्र की ओर बढ़ रहा था। जैसे ही श्री कृष्ण को पता चला कि बर्बरीक युद्ध के मैदान की ओर आ रहा है, वह आशंका से भर गए। उन्हें डर था कि यह योद्धा कौरव सेना का साथ देगा। बर्बरीक का कौरवों की ओर से युद्ध करना मतलब पांडवों की हार होना श्री कृष्ण का भयभीत होना बनता भी था क्योंकि बर्बरीक अपने पिता घटोत्कच से भी ज्यादा मायावी और शक्तिशाली थे। कर्ण जैसा दानी शक्ति स्वरूप के अनन्य उपासक इस पूजा से और गुरु विजय सिद्ध सेन की कृपा से उन्हें अतुलनीय शक्ति।

इंद्रियों को वश में करने का वरदान और तीन अचूक तीर मिले थे, जो हमेशा उनके पास रहते थे। ये साधारण नहीं थे। उन्हें जिस भी लक्ष्य पर चलाया जाता था, उनका छेद होना तय था। लेकिन अपने दादा भीम का पक्ष छोड़कर कौरवों की ओर से बराबरी क्यों युद्ध करेगा? तो उत्तर है उनके गुरु की शिक्षा। गुरु ने कहा था कि युद्ध में सदैव निर्बलों का साथ देना। भगवान श्रीकृष्ण को बस इसी बात की चिंता थी। जब बर्बरीक पांडवों के शिविर में पहुंचे तो श्री कृष्ण ने उन्हें अपने पितामह के पक्ष में युद्ध करने को कहा। इस पर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि उसने अपने स्वामी को वचन दिया था कि वह हमेशा कमजोरों का साथ देंगे। इस युद्ध में जो भी हारता नजर आएगा वह उसके पक्ष में खड़ा होकर लड़ने लगेगा। साथ ही उन्होंने अपने तीन बाणों के गुण भी बताए।

एक विशाल सेना को नष्ट करने के लिए केवल दो तीर ही काफी थे। यह सुनकर पांडवों के शिविर में हाहाकार मच गया। उन्हें लगा कि यदि कौरव हारने लगे तो बर्बरीक कौरवों की ओर से युद्ध करने लगेगा। श्री कृष्ण को भी इसकी जानकारी थी। वह जानता था कि इस धर्म युद्ध में अधर्म की पराजय निश्चित है अर्थात कौरवों की पराजय होगी। लेकिन जैसे ही बर्बरीक कौरवों को पराजित होता देखेगा वह अपनी प्रतिज्ञा के उनकी ओर से युद्ध करेगा। श्री कृष्ण ने बर्बरीक से पूछा कि यदि वह युद्ध न करे तो क्या होगा? इस पर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि ऐसा नहीं हो सकता। मैं एक योद्धा हूं और मैं निश्चित रूप से लडूंगा। गुरु को दिया हुआ वचन भी पूरा करूंगा। यह कहकर बर्बरीक बाहर चला गया। इसके बाद पांडवों के शिविर में चर्चा होने लगी। तय हुआ कि श्री कृष्ण संकट से निकलने का उपाय खोजेंगे। अगले दिन श्री कृष्ण ब्राह्मण के वेश में बर्बरीक के पास पहुंचे। तब वे साधना में लीन थे। उनके पास तीन तीर रखे हुए थे। ब्राह्मण को देखकर बर्बरीक ध्यान मुद्रा से बाहर आया और उनके चरणों में प्रणाम किया। ब्राह्मण ने पूछा यह पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान मुद्रा में बैठने का क्या कारण है और तुम कौन हो?

बर्बरीक ने उन्हें अपना परिचय दिया और बताया कि वे युद्ध करने आए हैं। इस पर ब्राह्मण ने कहा, आपके पास तीन ही तीर हैं। तुम उनमें से कौन से तीर से लड़ोगे? इस पर बर्बरीक ने उन बाणों के निष्फल होने की सारी कहानी सुनाई। ब्राह्मण ने पीपल के पेड़ की ओर उंगली करके कहा, मान लीजिए यह पेड़ एक विशाल सेना है और इसका प्रत्येक पत्ता एक सैनिक है। तुम इन बाणों से इन्हें कैसे भी दोगे। इस पर जैसे ही बर्बरीक अपने बाणों का चमत्कार दिखाने के लिए धनुष उठाने के लिए मुड़े। श्री कृष्ण ने अपने पैरों के नीचे एक पीपल का पत्ता बिछा दिया। बर्बरीक ने अपने धनुष से बाण चलाया और उस पीपल के पेड़ की ओर छोड़ दिया। सभी पत्तों में छेद हो गया। इसके बाद जैसे ही उसने दूसरा तीर छोड़ा, सारे पत्ते जमीन पर गिर गए और तीर ब्राह्मण के पैरों में लग गया। ब्राह्मण के पैरों से खून बहता देख बर्बरीक हैरान रह गया। उसने महसूस किया कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं है अन्यथा यह मर गया होता। बर्बरीक यह सब सोच रहा था कि ब्राह्मण बने श्रीकृष्ण ने कहा तेरे बाण अचूक और चमत्कारी हैं महाबली। क्या तुम इस ब्राह्मण को कुछ दान नहीं दोगे?

5 comments

  1. कृपया बर्बरीक ने शक्ति कैसे प्राप्त की ! बताएं

  2. बहुत सुंदर और ज्ञानवर्धक और नवीन जानकारी प्राप्त हुई और हार्दिक अभिनंदन और सादर अभिवादन और आभार।

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