कैसे टूटा नारदजी का घमंड?

नारायण नारायण की स्तुति करने वाले नारद मुनि भगवान विष्णु के ना केवल परम भक्त माने जाते हैं बल्कि उन्हें संसार के पहले संदेशवाहक के रूप में भी पहचाना जाता है। सृष्टि के प्रथम संदेशवाहक संगीत कला और साहित्य के ज्ञाता नारद को सभी विद्याओं में महारत हासिल थी। ब्रह्मपुत्र नारद ने जनकल्याण को प्राथमिकता दी और लोकहित में समस्त कार्य किए। यही वजह है कि हर वर्ष जेष्ठ कृष्ण पक्ष माह में आज भी नारद मुनि की जयंती को लोग हर्ष और उल्लास से मनाते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार इस दिन नारद मुनि का जन्म हुआ था और उनके भक्तों के लिए यह दिन विशेष महत्व रखता है। भले ही नारद को देव ऋषि कहा गया हो, लेकिन उनका कार्य केवल देवताओं तो कि संदेश पहुंचाना नहीं था बल्कि दानवों और मनुष्य के वीर्य संदेशवाहक और मित्र थे और वे आगामी खतरों को लेकर लोगों को पहले ही सचेत किया करते थे।

श्रीमद्भागवत का जो भक्ति ज्ञान एवं वैराग्य का प्रमुख देश हमें मिला है, वह देवर्षि नारद की ही देन है। एक बार नारद पृथ्वी का भ्रमण कर रहे थे। तब उन्हें एक उनके खास बाग जो एक नगर का सही था। नहीं याद किया। अच्छे संस्कार के बाद सेठ ने नारद जी से प्रार्थना की कि आप कोई ऐसी युक्ति करें कि कम से कम एक बच्चा हो जाए। नारद जी ने आशीर्वाद दिया और कहा तुम लोग चिंता ना करो। मैं अभी नारायण से मिलने जा रहा हूं। उन तक मैं तुम्हारी प्रार्थना पहुंचा देता हूं। वह कुछ अवश्य करेंगे। नारद विष्णु धाम पहुंचकर विष्णु जी से मिल।और सेठ की व्यथा बताई। भगवान भोले उसके भाग्य में संतान का सुख नहीं है। नारद ने एक दीए में तेल ऊपर तक भरा और अपनी हथेली पर सजा कर पूरे विश्व की यात्रा की अपनी निर्विघ्नं यात्रा का समापन उसने विष्णु धाम पर आकर ही संपन्न किया। इस पूरी प्रक्रिया में नारद को बड़ा।

घमंड हो गया कि उनसे ज्यादा ज्ञानी और विष्णु भक्त कोई और नहीं कुछ समय बाद जब नारद पृथ्वी लोक पर सेठ के घर पहुंचे। सेठ के घर में छोटे-छोटे बच्चे घूम रहे थे। नारद ने जानना चाहा कि यह संतान किसकी है तो सेठ बोले, आपकी है नारद इस बात से खुश नहीं हुए। उन्होंने कहा, क्या बात है साफ-साफ बताओ, सीट बोला, एक दिन एक साधु हमारे घर के सामने से गुजर रहा था। उसने बोला कि एक रोटी दो तो एक बेटा और चार रोटी दो तो चार बेटे। मैंने उसे चार रोटी खिलाई और कुछ समय बाद मेरे घर 4 पुत्र पैदा हुए नारद आगबबूला हुए और विष्णु की खबर लेने विष्णु धाम पहुंचे।नारद को देखते ही भगवान अत्यधिक पीड़ा से कराह रहे थे। उन्होंने नारद से बोला, मेरे पेट में भयंकर पीड़ा हो रही है और मुझे जो व्यक्ति अपने ह्रदय से लहू निकाल कर देगा, उसी से मुझे आराम मिलेगा।

नारद उल्टे पांव पृथ्वीलोक लोटे और पूरी दुनिया से विष्णु की व्यथा सुनाई पर कोई भी आदमी तैयार नहीं हुआ। जब नारद ने यह बात एक साधु को सुनाई तो वह बहुत खुश हुआ। उसने चुरा निकाला और एकदम अपने सीने में गांव अपने लगा और बोला, मेरे प्रभु की पीड़ा यदि मेरे लहू से ठीक होती है तो मैं अभी तुम्हें यह दिल निकाल कर देता हूं। जैसे ही साधु ने दिल निकालने के लिए चाकू अपने सीने में गोप ना चाहा। तभी विष्णु भगवान प्रकट हुए और बोले जो व्यक्ति मेरे लिए अपने जीवन का ध्यान दे सकता है। वह मेरे लिए अपनी संतान प्राप्ति के सुख को भी दान दे सकता है। साथ ही नाराज से यह भी कहा, तुम तू सर्वगुण संपन्न ऋषि होगी। तुम चाहते तो सेठ को स्वयं पुत्र दान दे सकते थे तब जाकर। ऋषि नारद को अपनी गलती का एहसास हुआ और परम विष्णु वक्त होने का उसका घमंड भी टूट गया।

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