कर्ण क्यों और कैसे बना कौरवों का मित्र?

आज हम बात करेंगे। महाभारत के एक विशेष वह महत्वपूर्ण पात्र करण की और इस बात पर भी चर्चा करेंगे कि कैसे हो कौरवों का घनिष्ठ मित्र बना। यह तो हम जानते ही हैं कि कौरवों के लोग ने एक भयंकर ग्रह युद्ध का रूप लिया, जिसे हम महाभारत के नाम से जानते हैं तो इस पूरे प्रकरण में करण की क्या भूमिका थी। क्यों कर्ण दुर्योधन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। कारण ने क्यों नहीं छोड़ा कौरवों का साथ ऐसे ही कुछ प्रश्नों के उत्तर जानेंगे। हम आज की कड़ी में आप से अनुरोध है की पूरी जानकारी के लिए कृपया वीडियो को अंत तक देखें। फॉरवर्ड को अर्जुन के काट के रूप में प्रयोग करना चाहते थे। यह उस समय की बात है जापान।

ख्वाबों की एक सभा में अपनी शिक्षा पूरी करने के पश्चात करण भी पहुंचा। इस सभा में करण अपनी धनुर्विद्या का कौशल दिखाना चाहता था। जब कर्ण ने अपनी विद्या का पराक्रम दिखाया तो पांडवों की ओर से प्रश्न उठे कि यह एक क्षत्रिय नहीं है। इसको इस सभा में आमंत्रित नहीं किया गया है। कौन हो तुम इस प्रतियोगिता में भाग लेने का तुम्हारा साहस भी कैसे हो घूम लिया। क्या या खड़े होकर प्रश्न किया। तुम किसके पुत्र हो। इतने प्रश्न सुनकर करण का आत्मविश्वास डगमगा गया। करण ने उत्तर दिया कि मैं 24:00 का पुत्र हूं। यह सुनकर पांडवों ने कहा, तुम तो सूट पुत्र हो और तुम क्षत्रियों की सभा में प्रवेश कर गए। यहां से तुरंत चले जाओ। यह सुनकर करण को पीड़ा का अनुभव हुआ। परंतु दुर्योधन को अपनी सेना में एक महान धनुर्धर को सम्मिलित करने का अच्छा अवसर प्राप्त हुआ क्योंकि उसके भाइयों में किसी को भी धनुर्विद्या का ज्ञान नहीं था।

उसे विश्वास था कि युधिष्ठिर भीम नकुल सहदेव।वह तो वह हरा देगा परंतु अर्जुन जैसे धनुर्धर को हराना उसके लिए एक बड़ी चुनौती थी। अतः करण जो अर्जुन से भी बेहतर धनुर्धर था के हुनर को देखते ही तत्काल दुर्योधन कर्ण की ओर से बोला और राजा से प्रार्थना की कि पिताश्री शास्त्रों के अनुसार एक व्यक्ति ने राजा बनने के लिए 3 में से 1 गुण होना आवश्यक है या तो वह राजा का पुत्र हो या उसने अपने साहस व पराक्रम से किसी राजा को परास्त किया हो या फिर उसने स्वयं किसी राज्य की स्थापना की हो।

यदि अर्जुन कर्ण के राजा ना होने के कारण इससे नहीं लड़ना चाहता तो मैं इसे अभी राजा बना देता हूं। यहां से मीलों दूर अंग नाम का एक छोटा सा राज्य है। वहां कोई राजा नहीं है। मैं अभी करण को अंग देश का राजा घोषित करता हूं। दुर्योधन ने तभी एक पुजारी को बुलाया और वहीं पर करण का राजतिलक कर दिया। दुर्योधन ने तत्पश्चात घोषणा की कि यह अंगराज कर्ण है। अर्जुन इसके जन्म का सहारा लेकर लड़ने से नहीं बच सकता।इसके पिता जो भी हो परंतु मैं इसे अपना मित्र स्वीकार करता हूं।

उसने कल को गले लगाकर कहा, तुम अब से एक राजा तथा मेरे भाई हो। करण को असीमित उत्साह की अनुभूति हुई क्योंकि पूरे जीवन सूत पुत्र होने के कारण उसे अपमानित होना पड़ा। अबे दुर्योधन का ऋणी हो गया था। अश्वत्थामा शकुनी और अब करण के आने से गौरव अत्यधिक शक्तिशाली हो गए थे। दुर्योधन को कान पर पूर्ण विश्वास था कि वह युद्ध में कौरवों को विजय दिलाएगा।

करने भी वचन दिया कि किसी भी परिस्थिति में मैं तुम्हारा ही साथ दूंगा। महारथी कर्ण को ज्ञात था कि वह धर्म के पक्ष में है परंतु मित्रता के कारण मैं अपना पक्ष नहीं बदल पाया। एक राजा के पुत्र ने उसे गले लगाया और राजा बना दिया। इससे बढ़कर उसके लिए कुछ भी नहीं था तो मित्रो इस प्रकार भी करण तथा कौरवों की घनिष्ठ मित्रता परंतु पांडव केवल 5 होते हुए भी भगवान कृष्ण की सहायता से गौरव पर भारी पड़े और अंततः उनकी विजय हुई। महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ और एक नव भारत की स्थापना हुई तो मित्रों आज की चर्चा हम यहीं पर समाप्त करेंगे।

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