कई सालों से जल रही है चमत्कारिक ज्वाला,वैज्ञानिक भी नहीं जान सके इसका राज

नमस्कार दोस्तों! नवरात्रों के पावन पर्व की सभी श्रोताओं को हार्दिक शुभकामनाएं। नवरात्रों के ये नौ दिन जो भी भक्त मातारानी की अराधना सच्चे मन से करता है, भगवती मां उनकी सब मनोकामनाएं पूरी करती है। आज के अध्याय में हम जानेंगे ज्वाला मां की दिव्य ज्योति का अनसुलझा रहस्य, जिसे आज तक कोई नहीं जान सका। मां भगवती के शक्तिपीठों में से एक है ज्वाला देवी मां ज्वाला का मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में कालीधार पहाड़ी के बीच बसा है। इस मंदिर का सबसे बड़ा चमत्कार यह है इसमें किसी मूर्ति की नहीं बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकल रही नौ ज्वालाओं की पूजा होती है। यह नौ ज्वालाएं मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतीक हैं। इस ज्वाला का रहस्य जानने के लिए पिछले कई साल से भू वैज्ञानिक जुटे हुए हैं, लेकिन नौ किलोमीटर खुदाई करने के बाद भी उन्हें आज तक वह जगह ही नहीं मिली।

यहां से किसी तरह की भी प्राकृतिक गैस निकलती हो। ज्वाला माता के मंदिर की महिमा ऐसी है कि यहां मां खुद ही लौ बनकर जलती है। वह भी बिना रुके और बिना किसी ईंधन के। सबसे पहले इस मंदिर का निर्माण राजा भूमि चंद्र ने करवाया था। यहां पर पृथ्वी के गर्भ से निकलती इन ज्वालाओं पर ही मंदिर बना दिया गया। इन नौ ज्योतियों को महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अंबिका और अंजी देवी के नाम से पूजा जाता है। बाद में 1835 में महाराजा रंजीत सिंह और राजा संसारचंद ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया। हमारी पौराणिक गाथाओं के अनुसार इस मंदिर को पांच पांडवों ने खोजा था। इसकी उत्पत्ति की कहानी मां सती से संबंधित है।

तो बात उस समय की है जब राक्षसों ने हिमालय पर्वत पर आक्रमण कर दिया। भगवान विष्णु के नेतृत्व में देवताओं ने उन्हें रोकने का फैसला किया। अपना ध्यान केंद्रित कर देवताओं ने जमीन से आग की बड़ी लपटें उत्पन्न कर दी। उस आग से एक दिव्य कन्या की उत्पत्ति हुई, जिसे आदिशक्ति के रूप में माना गया। सती या पार्वती के नाम से विख्यात यह कन्या प्रजापति दक्ष के घर में पली और बाद में भगवान शिव की पत्नी बनी। एक बार जब उसके पिता ने भगवान शिव का अपमान किया तो सती बेहद आहत हो गई और उसने खुद के प्राण दे दिए। जब भगवान शिव ने अपनी पत्नी की मृत्यु के बारे में सुना तो उनके क्रोध की कोई सीमा न रही। सती के शरीर को थामे उन्होंने तीनों लोक में त्राहिमाम कर दिया। अन्य देवतागण भगवान शिव के क्रोध से डर गए और भगवान विष्णु को मदद के लिए पुकारा। भगवान विष्णु ने तीर की एक श्रृंखला साधते हुए सती के शरीर को नष्ट करने के लिए टुकड़ों में तोड़ा। उन स्थानों पर यहां यहां मां सती के शरीर के टुकड़े गिरे।

51 पवित्र शक्तिपीठ अस्तित्व में आए। मां सती की जीभ उसी जगह गिरी जिस जगह आज ज्वाला जी का मंदिर है। सदियों पहले एक चरवाहे ने पाया कि उसकी गायों में से एक गाय हमेशा दूध के बिना होती थी। कारण जानने के लिए वह गाय पर नजर रखने लगा। उसने जंगल से बाहर आती एक लड़की को देखा जिसने गाय का दूध पिया और फिर वह अंतर्ध्यान हो गई। हैरान होकर चरवाहा राजा के पास गया और उसने उसे पूरी कहानी बताई। राजा इस कथा के बारे में जानता था कि इस क्षेत्र में सती की जीभ गिरी है। राजा ने उस पवित्र स्थान को खोजने के लिए बहुत प्रयत्न किए पर सफलता न मिली। फिर कुछ साल बाद राजा को खबर मिली कि पहाड़ों में मां ज्वाला जलती देखी गई है। राजा ने मौके पर पहुंचकर पवित्र लौ के दर्शन किए और वहां एक मंदिर बनवाया। नियमित पूजा के लिए पुजारी की व्यवस्था भी की गई। अपने आध्यात्मिक आग्रह को पूरा करने के लिए हजारों तीर्थ यात्री वर्षभर मंदिर की यात्रा करते हैं। मुगल सम्राट अकबर ने एक बार लोहे की चादर से ज्वाला ढककर आग बुझाने की कोशिश की और यहां तक कि इसके लिए पानी भी लगाया, लेकिन लपटों ने इन सभी प्रयासों को नष्ट कर दिया।

आखिर अकबर को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने तीर्थ स्थल पर एक सोने का छतर प्रस्तुत किया। हालांकि देवी की शक्ति ने उस सोने के छत्र को किसी अन्य धातु में परिवर्तित कर दिया जो अभी भी दुनिया के लिए एक पहेली बनी हुई है। दुनिया भर के वैज्ञानिक इस छत्र के धातु को पहचानने में आज भी असमर्थ हैं। शीशे के ताबूत में यह छत्र आज भी ज्वाला मां के मंदिर में देखा जा सकता है। ऐसी है ज्वाला मां की महिमा। उम्मीद करते हैं दोस्तों ज्वाला मां की महिमा का गुणगान आपको बेहद पसंद आया होगा।

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